Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 261

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
व꣣यं꣡ घ꣢ त्वा सु꣣ता꣡व꣢न्त꣣ आ꣢पो꣣ न꣢ वृ꣣क्त꣡ब꣢र्हिषः । प꣣वि꣡त्र꣢स्य प्र꣣स्र꣡व꣢णेषु वृत्रह꣣न्प꣡रि꣢ स्तो꣣ता꣡र꣢ आसते ॥२६१॥

व꣣य꣢म् । घ꣣ । त्वा । सुता꣡व꣢न्तः । आ꣡पः꣢꣯ । न । वृ꣣क्त꣡ब꣢र्हिषः । वृ꣣क्त꣢ । ब꣣र्हिषः । पवि꣡त्र꣢स्य । प्र꣣स्र꣡व꣢णेषु । प्र꣣ । स्र꣡व꣢꣯णेषु । वृ꣣त्रहन् । वृत्र । हन् । प꣡रि꣢꣯ । स्तो꣣ता꣡रः꣢ । आ꣣सते ॥२६१॥

Mantra without Swara
वयं घ त्वा सुतावन्त आपो न वृक्तबर्हिषः । पवित्रस्य प्रस्रवणेषु वृत्रहन्परि स्तोतार आसते ॥

वयम् । घ । त्वा । सुतावन्तः । आपः । न । वृक्तबर्हिषः । वृक्त । बर्हिषः । पवित्रस्य । प्रस्रवणेषु । प्र । स्रवणेषु । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । परि । स्तोतारः । आसते ॥२६१॥

Samveda - Mantra Number : 261
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वृत्रहन्) दुर्गुणनाशक परमात्मन् ! (सुतावन्तः) जिन्होंने सोम तैयार कर लिया वा मन शुद्ध कर लिया है (वृक्तबर्हिषः) जिन्होंने यज्ञ विस्तीर्ण किया हुआ है ऐसे (स्तोतारः) स्तुतिकर्त्ता (वयम्) हम लोग (घ) निश्चय (न) जैसे (पवित्रस्य) शुद्ध देश के (प्रस्रवणेषु) झरनों में (आपः) जल (परि आसते) सब ओर से शान्त स्थित होते हैं तद्वत् शान्तचित्त हो उपासना कर रहे हैं॥
जिस प्रकार शुद्ध देश के झरनों में शुद्ध शान्त जल नम्रतापूर्वक नीचे को फैलते हैं तद्वत् हम भी सोम को सम्पन्न किए हुए वा मन को शुद्ध किए हुए, यज्ञ का विस्तार करते हुए, स्तुतिपाठ करते हुए, शान्तचित्त आपकी उपासना करते हैं॥
Footnote
ऋ० ८। ३३। १ में भी॥