Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 260

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- रेभः काश्यपः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
मा꣡ न꣢ इन्द्र꣣ प꣡रा꣢ वृण꣣ग्भ꣡वा꣢ नः सध꣣मा꣡द्ये꣢ । त्वं꣡ न꣢ ऊ꣣ती꣢꣫ त्वमिन्न꣣ आ꣢प्यं꣣ मा꣡ न꣢ इन्द्र꣣ प꣡रा꣢ वृणक् ॥२६०॥

मा꣢ । नः꣣ । इन्द्र । प꣡रा꣢꣯ वृ꣣णक् । भ꣡व꣢꣯ । नः꣣ । सधमा꣡द्ये꣢ । स꣣ध । मा꣡द्ये꣢꣯ । त्वम् । नः꣣ । ऊती꣢ । त्वम् । इत् । नः꣣ । आ꣡प्य꣢꣯म् । मा । नः꣢ । इन्द्र । प꣡रा꣢꣯ । वृ꣣णक् ॥२६०॥

Mantra without Swara
मा न इन्द्र परा वृणग्भवा नः सधमाद्ये । त्वं न ऊती त्वमिन्न आप्यं मा न इन्द्र परा वृणक् ॥

मा । नः । इन्द्र । परा वृणक् । भव । नः । सधमाद्ये । सध । माद्ये । त्वम् । नः । ऊती । त्वम् । इत् । नः । आप्यम् । मा । नः । इन्द्र । परा । वृणक् ॥२६०॥

Samveda - Mantra Number : 260
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे परमेश्वर ! (नः) हम को (मा परावृणक्) मत छोड़िये (नः) हमारे (सधमाद्ये) साथ हर्षदायक यज्ञ में (त्वम्) आप (नः) हमारे (ऊती) रक्षक (भव) हूजिये। (त्वम् इत्) आप ही (नः) हमारे (आप्यम्) बन्धु हैं। अतः (इन्द्र) हे परमेश्वर ! (नः) हम को (मा परावृणक्) मत त्यागिये।
प्रश्न — परमात्मा सर्वगत है फिर किसी को कैसे त्याग सकता है ?
उत्तर — जैसे जाति से त्याग देते हैं। अर्थात् उसे अपनी जाति का नहीं मानते ऐसे ही परमात्मा की अकृपा वा अपनी भक्ति से पृथक् जानना ही परित्याग जानिए॥ “ऊती” यह “व्यत्यय से कर्त्ता में क्तिच् से निपात है” यह सायणाचार्य भी लिखते हैं॥ “हमको मत छोड़िये” इस वाक्य का दो बार पाठ इसलिए है कि जिससे अत्यन्त ईप्सा (इच्छा) समझी जावे।
Footnote
ऋ० ८। ९७। ७ में भी॥