Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 26

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
नि꣡ त्वा꣢ नक्ष्य विश्पते द्यु꣣म꣡न्तं꣢ धीमहे व꣣य꣢म् । सु꣣वी꣡र꣢मग्न आहुत ॥२६॥

नि꣢ । त्वा꣣ । नक्ष्य । विश्पते । द्युम꣡न्त꣢म् । धी꣣महे । वय꣢म् सु꣣वी꣡र꣢म् । सु꣣ । वी꣡र꣢꣯म् । अ꣣ग्ने । आहुत । आ । हुत ॥२६॥

Mantra without Swara
नि त्वा नक्ष्य विश्पते द्युमन्तं धीमहे वयम् । सुवीरमग्न आहुत ॥

नि । त्वा । नक्ष्य । विश्पते । द्युमन्तम् । धीमहे । वयम् सुवीरम् । सु । वीरम् । अग्ने । आहुत । आ । हुत ॥२६॥

Samveda - Mantra Number : 26
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(नक्ष्य) हे शरण्य ! (विश्पते) हे प्रजापते ! (आहुत) हे भक्तों से आह्वान किये हुए ! (अग्ने) परमात्मन् ! (वयम्) हम लोग (सुवीरम्) श्रेष्ठ भक्त पुरुषों वाले (द्युमन्तम्) प्रकाशस्वरूप (त्वा) आपका (नि-धीमहे) निरन्तर ध्यान करते हैं॥
भौतिक पक्ष में (नक्ष्य) सेवनीय ! (विश्पते) प्रजापालक ! (आहुत) सब ओर से जिस में होम किया जावे ऐसे (अग्ने), (वयम्) हम (त्वा) तुझे (नि-धीमहे) नितराम् आधान करते हैं।
आशय यह है कि अग्नि सेवनयोग्य है, यज्ञ और शिल्पद्वारा प्रजा का पालक है, और सब ओर से होम करने योग्य तथा शिल्प में उपयोग लेने योग्य है, द्युमान् = प्रकाशगुणविशिष्ट है, जो उसको होम वा नानाविध शिल्पक्रिया में प्रयुक्त करते हैं वे सुन्दर वीर होते हैं इसलिये उसका बीच में स्थापन करके चारों ओर बैठकर होम करना चाहिये तथा शिल्पक्रिया द्वारा अनेक प्रकार से उपयोग लेना चाहिये॥
Footnote
निघं० १।१६॥ २। १८॥ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ७।१५।७ में “धीमहे वयम्” के स्थान में “देव धीमहे” इतना पाठान्तर है॥