Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 257

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेधपुरुमेधावाङ्गिरसौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ व꣣ इ꣡न्द्रा꣢य बृह꣣ते꣡ मरु꣢꣯तो꣣ ब्र꣡ह्मा꣢र्चत । वृ꣣त्र꣡ꣳ ह꣢नति वृत्र꣣हा꣢ श꣣त꣡क्र꣢तु꣣र्वज्रेण श꣣त꣡प꣢र्वणा ॥२५७॥

प्र꣢ । वः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । बृ꣣हते꣢ । म꣡रु꣢꣯तः । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । अ꣣र्चत । वृत्र꣢म् । ह꣢नति । वृत्रहा꣢ । वृ꣣त्र । हा꣢ । श꣣त꣡क्र꣢तुः । श꣣त꣢ । क्र꣣तुः । व꣡ज्रे꣢꣯ण । श꣣त꣡प꣢र्वणा । श꣣त꣢ । प꣣र्वणा ॥२५७॥

Mantra without Swara
प्र व इन्द्राय बृहते मरुतो ब्रह्मार्चत । वृत्रꣳ हनति वृत्रहा शतक्रतुर्वज्रेण शतपर्वणा ॥

प्र । वः । इन्द्राय । बृहते । मरुतः । ब्रह्म । अर्चत । वृत्रम् । हनति । वृत्रहा । वृत्र । हा । शतक्रतुः । शत । क्रतुः । वज्रेण । शतपर्वणा । शत । पर्वणा ॥२५७॥

Samveda - Mantra Number : 257
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(मरुतः) हे स्तोताओ ! (वः) तुम अपने (बृहते) महान् (इन्द्राय) ईश्वर के लिये (ब्रह्म) सामवेद के वचन (प्र, अर्चत) अर्पित करा। (वृत्रहा) पापनाशक (शतक्रतुः) बहुविध कर्म वाला वह (शतपर्वणा) बहुत धारों वाले (वज्रेण) वज्र से (वृत्रम्) पाप को (हनति) मारता है॥
जो लोग परमात्मा की स्तुति प्रार्थना उपासना में लगे रहते हैं, उनको सर्वव्यापक परमात्मा सर्वत्र पापियों के नाश के लिये अनन्तधार वाले वज्र लिए प्रतीत होता है ! अर्थात् वे छुपकर भी पाप नहीं करते। क्योंकि अन्य राजा आदि के एकदेशीय वज्र से तो कोई किसी प्रकार बच भी सकता है परन्तु परमात्मा की सृष्टि का प्रत्येक परमाणु भी उसके वज्र का काम दे सकता है और मनुष्य को नष्ट कर सकता है। इसलिए उसका वज्र अनन्तघार है।
Footnote
निघण्टु ३। १८ निरुक्त ११। १३ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ८। ८९। ३ में भी॥