Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 255

1875 Mantra
Devata- मित्रावरुणादित्याः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ मि꣣त्रा꣢य꣣ प्रा꣢र्य꣣म्णे꣡ स꣢च꣣꣬थ्य꣢꣯मृतावसो । व꣣रूथ्ये꣢३ व꣡रु꣢णे꣣ छ꣢न्द्यं꣣ व꣡चः꣢ स्तो꣣त्र꣡ꣳ राज꣢꣯सु गायत ॥२५५॥

प्र꣢ । मि꣣त्रा꣡य꣢ । मि꣣ । त्रा꣡य꣢꣯ । प्र । अ꣣र्यम्णे꣢ । स꣣च꣡थ्य꣢म् । ऋ꣣तावसो । ऋत । वसो । व꣣रूथ्ये꣢꣯ । व꣡रु꣢꣯णे । छ꣡न्द्य꣢꣯म् । व꣡चः꣢꣯ । स्तो꣣त्र꣢म् । रा꣡ज꣢꣯सु । गा꣣यत ॥२५५॥

Mantra without Swara
प्र मित्राय प्रार्यम्णे सचथ्यमृतावसो । वरूथ्ये३ वरुणे छन्द्यं वचः स्तोत्रꣳ राजसु गायत ॥

प्र । मित्राय । मि । त्राय । प्र । अर्यम्णे । सचथ्यम् । ऋतावसो । ऋत । वसो । वरूथ्ये । वरुणे । छन्द्यम् । वचः । स्तोत्रम् । राजसु । गायत ॥२५५॥

Samveda - Mantra Number : 255
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(ऋतावसो) हे यज्ञधन ! यजमान ! (मित्राय) मित्रनाम वायुभेद के लिये (सचथ्यम्) सेवन योग्य (स्तोत्रम्) गुण कीर्तन रूप (छन्द्यम्) वैदिक (वचः) वचन को (प्र, गाय) गावो और (अर्यम्णे) यम नामक वायु के लिये (प्र) गावो तथा (वरूथ्ये) गृहहितकारी (वरुणे) वरुरण के लिये गावो। (राजसु) इस प्रकार मित्र अर्यमा और वरुण इन ३ राजों अर्थात् प्रकाशमानों के लिये कीर्तन करो॥
अर्थात् हे यज्ञकर्त्ता ! यदि तू पूर्व मन्त्रानुसार अन्नादि की समृद्धि को मांगता है तो मित्र अर्यमा वरुणादि वर्षा के सहायक वायुभेद रूप देवतों के गुण कर्म स्वभाव को वेद मन्त्रों द्वारा जानकर तदनुकूल सेवन योग्य अनुष्ठान कर। इससे अन्नादि की समृद्धि होगी। यह पूर्वमन्त्र की याचना का उत्तर जानो॥ मित्र अर्यमा वरुण पदों से निघण्टु ५। ४ और निरुक्त अध्याय ११ के अनुसार अन्तरिक्षस्थानी वायुभेदों का ग्रहण जानिये॥ “प्र” इस उपसर्ग का दो बार पाठ ही “गायत” क्रिया के पुनर्वार अन्वय का सूचक है॥
Footnote
निघं० ३। ४ में वरूथ गृह का नाम है। ऋ० ८। १०१। ५ में भी॥