Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 25

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡ग्ने꣢ यु꣣ङ्क्ष्वा꣡ हि ये तवाश्वा꣢꣯सो देव सा꣣ध꣡वः꣢ । अ꣢रं꣣ व꣡ह꣢न्त्या꣣श꣡वः꣢ ॥२५॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । यु꣣ङ्क्ष्वा꣢ । हि । ये । त꣡व꣢꣯ । अ꣡श्वा꣢꣯सः । दे꣣व । साध꣡वः꣢ । अ꣡र꣢꣯म् । व꣡ह꣢꣯न्ति । आ꣣श꣡वः꣢ ॥२५॥

Mantra without Swara
अग्ने युङ्क्ष्वा हि ये तवाश्वासो देव साधवः । अरं वहन्त्याशवः ॥

अग्ने । युङ्क्ष्वा । हि । ये । तव । अश्वासः । देव । साधवः । अरम् । वहन्ति । आशवः ॥२५॥

Samveda - Mantra Number : 25
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(देव) द्योतमान-प्रकाशमान ! (अग्ने) पूजनीयेश्वर ! (ये, तव) जो, तेरे (साधवः) साधने वाले (आशवः) शीघ्र करने वाले (अश्वासः) व्यापक गुण हैं, उन्हें (हि) शीघ्र (युङ्क्ष्व) युक्त कर, वे गुण (अरम्) भरपूर (वहन्ति) पहुँचाते हैं॥
जिस प्रकार कोई राजा आदि वेग वाले अश्वादि पर चढ़कर तत्काल अपनी प्रजा की रक्षार्थ पहुँचता है, इसी प्रकार परमात्मा से इस मन्त्र में प्रार्थना की गई है। कि आप कृपा करके उन गुणों को जो साधने वाले हैं, जिनसे आप अपने कर्त्तव्य समस्त कार्यों को सिद्ध करते हैं, और तत्क्षण ही उन-उन कार्यों को सिद्ध करने को समर्थ हैं, और अश्वासः = जो व्यापक हैं। अर्थात् राजा आदि तो यानादि द्वारा प्रजा की रक्षार्थ पहुँचें इतने कुछ देर भी लगे परन्तु आप सर्वव्यापक हैं, साथ ही आपके वे गुण भी गुणी के साथ-साथ व्यापक हैं, इसलिए प्रतिक्षण आप अपने गुणों सहित सर्वत्र पहुँचे पहुँचाये हैं। इसलिये आपको शरणागत धर्मात्मा भक्तों की रक्षा में देरी करने का कारण नहीं॥
भौतिक पक्ष में (देव) दिव्यशक्तियुक्त ! विद्युत् रूप ! (अग्ने) अग्ने ! (ये तव) जो तेरे (आशवः) शीघ्रगामी (साधवः) हितसाधक (अश्वासः) तीव्र गुण हैं, उन्हें (हि) शीघ्र (युङ्क्ष्व) प्रयुक्तकर, वे तुझ को (अरम्) भरपूर (वहन्ति) बहाते-पहुँचाते अर्थात् भौतिकाग्नि में दिव्यगुण हैं इसलिये वह देव है, गुण “साधवः” जगत् के कार्य्यसाधक और “अश्वासः” घोड़ों के समान तीव्रगामी हैं तथा “आशु” = शीघ्र काम करने वाले हैं, उन गुणों से अग्नि सर्वत्र बड़ी शीघ्रता से पहुँच सकता है, इसलिये उनको यथावत् जानकर शिल्प यज्ञ और संग्राम आदि में भले प्रकार शीघ्रता से प्रयुक्त करना चाहिये। जिससे नालिक (बन्दूक) आदि द्वारा वे गुण शीघ्र अपना कार्य आरम्भ करें॥
Footnote
निघण्टु २।१५ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद ६।१६।४३ में “युङ्क्ष्व” के स्थान में “युक्ष्व” इतना भेद है॥