Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 246

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢ म꣣न्द्रै꣡रि꣢न्द्र꣣ ह꣡रि꣢भिर्या꣣हि꣢ म꣣यू꣡र꣢रोमभिः । मा꣢ त्वा꣣ के꣢ चि꣣न्नि꣡ ये꣢मु꣣रि꣢꣫न्न पा꣣शि꣢꣫नोऽति꣣ ध꣡न्वे꣢व꣣ ता꣡ꣳ इ꣢हि ॥२४६॥

आ꣢ । म꣣न्द्रैः꣢ । इ꣣न्द्र । ह꣡रि꣢꣯भिः । या꣣हि꣢ । म꣣यू꣡र꣢रोमभिः । म꣣यू꣡र꣢ । रो꣣मभिः । मा꣢ । त्वा꣣ । के꣢ । चित् । नि꣢ । ये꣣मुः । इ꣢त् । न । पा꣣शि꣡नः꣢ । अ꣡ति꣢꣯ । ध꣡न्व꣢꣯ । इ꣣व । ता꣢न् । इ꣣हि ॥२४६॥

Mantra without Swara
आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि मयूररोमभिः । मा त्वा के चिन्नि येमुरिन्न पाशिनोऽति धन्वेव ताꣳ इहि ॥

आ । मन्द्रैः । इन्द्र । हरिभिः । याहि । मयूररोमभिः । मयूर । रोमभिः । मा । त्वा । के । चित् । नि । येमुः । इत् । न । पाशिनः । अति । धन्व । इव । तान् । इहि ॥२४६॥

Samveda - Mantra Number : 246
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) सूर्य ! (मयूररोमभिः) जैसे मयूर के पंखों में अनेक रंग हैं ऐसे (मन्द्रैः) आनन्ददायक (हरिभिः) किरणों से (आ, याहि) आता है (त्वा) तुझे (के चित्) कोई भी (मा) नहीं (नियेमुः) बांध सकते (इत्) प्रत्युत तू ही (तान्) उन रोकने वाले अन्धकारादिकों को (अति इहि) उल्लंघन करके आता है। दृप्टान्त — (पाशिनः न) जैसे पाशहस्त व्याघलोग पक्षी को निग्रह करते हैं और (धन्वेव) धनुषधारी धनुष से शत्रु का निग्रह करता है तद्वत् अन्धकारादि का निग्रह करता है॥
इसमें सूर्य के दृष्टान्त से राजधर्म भी उपदिष्ट समझना चाहिये॥
Footnote
ऋ० ३। ४५। १ में जो पाठान्तर है वह संस्कृतभाष्य में देखिये॥