Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 245

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथि0मेध्यातिथी काण्वौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ त्वा꣢ स꣣ह꣢स्र꣣मा꣢ श꣣तं꣢ यु꣣क्ता꣡ रथे꣢꣯ हिर꣣ण्य꣡ये꣢ । ब्र꣣ह्म꣢युजो꣣ ह꣡र꣢य इन्द्र के꣣शि꣢नो꣣ व꣡ह꣢न्तु꣣ सो꣡म꣢पीतये ॥२४५॥

आ꣢ । त्वा꣣ । सह꣡स्र꣢म् । आ । श꣣त꣢म् । यु꣢क्ताः꣢ । र꣡थे꣢꣯ । हि꣣रण्य꣡ये꣢ । ब्र꣣ह्मयु꣡जः꣢ । ब्र꣣ह्म । यु꣡जः꣢꣯ । ह꣡र꣢꣯यः । इ꣣न्द्र । केशि꣡नः꣢ । व꣡ह꣢꣯न्तु । सो꣡म꣢꣯पीतये । सो꣡म꣢꣯ । पी꣣तये ॥२४५॥

Mantra without Swara
आ त्वा सहस्रमा शतं युक्ता रथे हिरण्यये । ब्रह्मयुजो हरय इन्द्र केशिनो वहन्तु सोमपीतये ॥

आ । त्वा । सहस्रम् । आ । शतम् । युक्ताः । रथे । हिरण्यये । ब्रह्मयुजः । ब्रह्म । युजः । हरयः । इन्द्र । केशिनः । वहन्तु । सोमपीतये । सोम । पीतये ॥२४५॥

Samveda - Mantra Number : 245
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) सूर्य ! (हिरण्यये) तेजोमय (रथे) रथवत् रमणीय पिण्ड में (युक्ताः) जुड़े हुए और (ब्रह्मयुजः) ब्रह्म के जोड़े हुए (केशिनः) केश के तुल्य प्रकाश की धारों वाले (आ सहस्रम्) असंख्य (हरयः) घोड़े के समान किरणें (त्वा) तुझ को (आ शतम्) बहुविध (सोमपीतये) सोमपान के लिये (वहन्तु) प्राप्त करते हैं॥
अर्थात् जब मनुष्य सोमादि ओषधियों से यज्ञ करते हैं तो सूर्य के तेजोमय गोले में ब्रह्म की जोड़ी हुई उसकी किरणें ओषधियों के हवन किये रस को खींचने के लिये सूर्य को प्राप्त करती हैं। सूर्य को रथी, गोले को रथ, और किरणों को घोड़ी की उपमा जानिये। तृतीयाध्याय के आरम्भ में (ब्रह्मवट्०) सायणाचार्य ने भी इस ऋचा का सूर्य देवता कहा है।
Footnote
निघण्टु ३।१॥ २।१५॥ शतपथ और अष्टाध्यायी ६।४।१७५ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ८। १। २४ में भी॥