Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 242

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रगाथो घौरः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
मा꣡ चि꣢द꣣न्य꣡द्वि श꣢꣯ꣳसत꣣ स꣡खा꣢यो꣣ मा꣡ रि꣢षण्यत । इ꣢न्द्र꣣मि꣡त्स्तो꣢ता꣣ वृ꣡ष꣢ण꣣ꣳ स꣡चा꣢ सु꣣ते꣡ मुहु꣢꣯रु꣣क्था꣡ च꣢ शꣳसत ॥२४२॥

मा꣢ । चि꣣त् । अन्य꣢त् । अ꣣न् । य꣢त् । वि । शँ꣣सत । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । मा꣢ । रि꣣षण्यत । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । इत् । स्तो꣣त । वृ꣡ष꣢꣯णम् । स꣡चा꣢꣯ । सु꣣ते꣢ । मु꣡हुः꣢꣯ । उ꣣क्था꣢ । च꣣ । शँसत ॥२४२॥

Mantra without Swara
मा चिदन्यद्वि शꣳसत सखायो मा रिषण्यत । इन्द्रमित्स्तोता वृषणꣳ सचा सुते मुहुरुक्था च शꣳसत ॥

मा । चित् । अन्यत् । अन् । यत् । वि । शँसत । सखायः । स । खायः । मा । रिषण्यत । इन्द्रम् । इत् । स्तोत । वृषणम् । सचा । सुते । मुहुः । उक्था । च । शँसत ॥२४२॥

Samveda - Mantra Number : 242
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सखायः) हे मित्रो ! (अन्यत्) और किसी को (मा चित्) मत (विशंसत) स्तुत करो किन्तु (सुते) मन शुद्ध करने पर (वृषणम्) धर्मार्थ काम के पूरा करने वाले (इन्द्रम्, इत्) परमात्मा की, ही (सचा) सब मिलकर (स्तोत) स्तुति करो (च) और (उक्था) स्तोत्रों को (मुहुः) बारम्बार (शंसत) पढ़ो। तथा (मा रिषण्यत) हिंसा मत करो॥
अर्थात् मनुष्य मात्र को परमात्मा के स्थान में अन्य की स्तुति न करनी चाहिये किन्तु परमात्मा की ही करनी चाहिए और उसी के स्तोत्रों का पाठ करना चाहिये। तथा प्राणिमात्र की हिंसा न करनी चाहिये॥
Footnote
ऋ० ८। १। १ में भी॥