Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 241

1875 Mantra
Devata- मरुतः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
न꣡ हि व꣢꣯श्चर꣣मं꣢ च꣣ न꣡ वसि꣢꣯ष्ठः प꣣रिम꣡ꣳस꣢ते । अ꣣स्मा꣡क꣢म꣣द्य꣢ म꣣रु꣡तः꣢ सु꣣ते꣢꣫ सचा꣣ वि꣡श्वे꣢ पिबन्तु का꣣मि꣡नः꣢ ॥२४१॥

न꣢ । हि । वः꣣ । चरम꣢म् । च꣣ । न꣢ । व꣡सि꣢꣯ष्ठः । प꣣रिमँ꣡स꣢ते । प꣣रि । मँ꣡स꣢꣯ते । अ꣣स्मा꣡क꣢म् । अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । म꣣रु꣡तः꣢ । सु꣣ते꣢ । स꣡चा꣢꣯ । वि꣡श्वे꣢꣯ । पि꣣बन्तु । कामि꣡नः꣢ ॥२४१॥

Mantra without Swara
न हि वश्चरमं च न वसिष्ठः परिमꣳसते । अस्माकमद्य मरुतः सुते सचा विश्वे पिबन्तु कामिनः ॥

न । हि । वः । चरमम् । च । न । वसिष्ठः । परिमँसते । परि । मँसते । अस्माकम् । अद्य । अ । द्य । मरुतः । सुते । सचा । विश्वे । पिबन्तु । कामिनः ॥२४१॥

Samveda - Mantra Number : 241
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(मरुतः) ऋत्विजो ! (वसिष्ठः) यजमान (वः) तुम में से (चरमं चन) अन्त के को भी (परि) छोड़ कर (नहि) नहीं (मंसते) सत्कार करता अर्थात् सभी को सत्कृत करता है। अतः (अस्माकम्) हमारे (सुते) सोम सम्पन्न होने पर (अद्य) आज (विश्वे) सब (कामिनः) चाहने वाले (सचा) एक साथ ही (पिबन्तु) पी लेवें॥
अध्यात्मपक्षे — (मरुतः) प्राणो ! (वसिष्ठः) आत्मा (वः चरमं, चन, न हि परि, मंसते) तुम में से, अन्तिम को, भी, नहीं छोड़कर, सत्कार करता है (विश्वे कामिनः) सब, चाहने वाले (अस्माकम्) हमारे (सुते) सम्पन्न मन में (अद्य) आज (सचा) एक साथ (पिबन्तु) तृप्त होवें॥
योगैश्वर्य को प्राप्त हुआ आत्मा कहता है कि हे प्राणो ! आज हमारे कुछ कमी नहीं, जब कि हमने मन को जीत कर खेंच लिया, आज सब काम पूर्ण हैं, अब तुम जितनी इच्छा हो, उतना आनन्दाऽमृत पान करो॥
Footnote
उणादि २। १०॥ निरुक्त ५। ५ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ७। ५६। ३ में “पिबत” पाठ है॥