Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 23

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡ग्ने꣢ मृ꣣ड꣢ म꣣हा꣢ꣳ अ꣣स्य꣢य꣣ आ꣡ दे꣢व꣣युं꣡ जन꣢꣯म् । इ꣣ये꣡थ꣢ ब꣣र्हि꣢रा꣣स꣡द꣢म् ॥२३॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । मृ꣣ड꣢ । म꣣हा꣢न् । अ꣣सि । अ꣡यः꣢꣯ । आ । दे꣣वयु꣢म् । ज꣡न꣢꣯म् । इ꣣ये꣡थ꣢ । ब꣣र्हिः꣢ । आ꣣स꣡द꣢म् । आ꣣ । स꣡द꣢म् ॥२३॥

Mantra without Swara
अग्ने मृड महाꣳ अस्यय आ देवयुं जनम् । इयेथ बर्हिरासदम् ॥

अग्ने । मृड । महान् । असि । अयः । आ । देवयुम् । जनम् । इयेथ । बर्हिः । आसदम् । आ । सदम् ॥२३॥

Samveda - Mantra Number : 23
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) पूजनीय ईश्वर ! हम को (मृड) सुख दो (महान्, असि) तुम महान् हो और (देवयुम्, जनम्) देवयजन चाहने वाले, मनुष्य की (अयः) प्राप्त होने वाले हो (बर्हिः) यज्ञस्थल में (आ -सदम्) विराजने को (आ इयेथ) प्राप्त होते हो॥
परमात्मा अपने धर्मात्मा भक्त उपासकों को सुख देता है और प्राप्त होता है जिसमे परमानन्ददायक है। परन्तु देवयु अर्थात् देव परमात्मा का यजन पूजन चाहने वाले को ही, न कि अभक्त अनुपासक नास्तिकादि को। वह महान् है। यद्यपि वह सर्वान्तर्यामी होने और सर्वगत होने से सब ही के हृदय में विराजता है परन्तु देवयु पुरुष के ही हृदय में उसको मिलता है, अन्य साधारण को नहीं।
भौतिक पक्ष में— (अग्ने) अग्ने ! (मृड) सुख दो (महान्, असि) तू महान् है (देवयुं, जनम्) वाय्वादि देवों के गुण खोजने की इच्छा वाले, पुरुष को (अयः) प्राप्त होने वाले हो (बर्हिः) यज्ञ और शिल्पस्थल में (आ —सदम्) स्थापित होने को (आ — इयेथ) प्राप्त होते हो॥
आशय यह है कि यदि अग्नि को शिल्पी लोग और ऋत्विज् लोग नानाविध क्रियाकलाप तथा यज्ञ में अच्छे प्रकार प्रयुक्त करें तो “सुखदायक” है, परन्तु साधारण लोग उससे सुख नहीं प्राप्त कर सकते हैं, न उसके इन गुणों को पा सकते हैं, किन्तु “देवयु” लोग जो वाय्वादि पदार्थ विद्या की खोज में रहते हैं वे ही प्राप्त होते हैं। वह अग्नि अपने गुणों से “महान्” है, उसे “यज्ञ और शिल्प कार्यालय स्थल में” स्थापित करना और सब प्रकार से प्राप्त करना चाहिए॥
Footnote
निघं० २।१४॥ ३।१८॥ अष्टाध्यायी ३।४।६ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद (५।९।१) में “महां असि य ईमा देवयम्” इतना पाठभेद है॥