Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 228

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- दुर्मित्रः कौत्सः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
क꣣दा꣡ व꣢सो स्तो꣣त्रं꣡ हर्य꣢꣯त आ꣡ अव꣢꣯ श्म꣣शा꣡ रु꣢ध꣣द्वाः꣢ । दी꣣र्घ꣢ꣳ सु꣣तं꣢ वा꣣ता꣡प्या꣢य ॥२२८॥

क꣣दा꣢ । व꣣सो । स्तोत्र꣢म् । ह꣡र्य꣢꣯ते । आ । अ꣡व꣢꣯ । श्म꣣शा꣢ । रु꣣धत् । वा꣡रिति꣢दी꣣र्घ꣢म् । सु꣣त꣢म् । वा꣣ता꣡प्या꣢य । वा꣣त । आ꣡प्या꣢꣯य ॥२२८॥

Mantra without Swara
कदा वसो स्तोत्रं हर्यत आ अव श्मशा रुधद्वाः । दीर्घꣳ सुतं वाताप्याय ॥

कदा । वसो । स्तोत्रम् । हर्यते । आ । अव । श्मशा । रुधत् । वारितिदीर्घम् । सुतम् । वाताप्याय । वात । आप्याय ॥२२८॥

Samveda - Mantra Number : 228
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 12;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वसो) निवास कराने वाले ! राजन् ! (कदा) यदि कभी (वाः) वर्षा का जल (अरुधत्) रुक जावे अर्थात् अनावृष्टि हो जावे तो (वाताप्याय) जल के लिये (श्मशा) नहर से (स्तोत्रम्) वेद के (हर्यंते) चाहने वाले (दीर्घम्) बड़े (सुतम्) पुत्रतुल्य प्रजाजन को (आ, अव) सर्वतः, रक्षित करो॥
Footnote
निघण्टु १। ६॥ निरुक्त ५। १२ और ६। २८ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० १०। १०५। १ में “आव श्मशा” पाठ है॥