Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 222

1875 Mantra
Devata- विष्णुः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣दं꣢꣫ विष्णु꣣र्वि꣡ च꣢क्रमे त्रे꣣धा꣡ नि द꣢꣯धे प꣣द꣢म् । स꣡मू꣢ढमस्य पाꣳसु꣣ले꣡ ॥२२२॥

इ꣣द꣢म् । वि꣡ष्णुः꣢꣯ । वि । च꣣क्रमे । त्रेधा꣢ । नि । द꣣धे । पद꣢म् । स꣡मू꣢꣯ढम् । सम् । ऊढम् । अस्य । पासुले꣢ ॥२२२॥

Mantra without Swara
इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूढमस्य पाꣳसुले ॥

इदम् । विष्णुः । वि । चक्रमे । त्रेधा । नि । दधे । पदम् । समूढम् । सम् । ऊढम् । अस्य । पासुले ॥२२२॥

Samveda - Mantra Number : 222
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(विष्णुः) यज्ञ का परमेश्वर (इदम्) इस जगत् को (त्रेधा) पृथिवी अन्तरिक्ष और द्यौः इन ३ प्रकार (विचक्रमे) पुरुषार्थयुक्त करे वा करता है। और (अस्य) इस जगत् के (पांसुले) प्रत्येक रज वा परमाणु में (समूढम्) अदृश्य (पदम्) स्वरूप को (निदधे) निरन्तर धारण करे वा करता है॥
भले प्रकार अनुष्ठान किया हुआ यज्ञ पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक में फैले और अपने अदृश्य स्वरूप को जगत् के रज-रज में पहुँचावे। अथवा व्यापक परमात्मा ने पृथिवी अन्तरिक्ष और द्युलोक को तीन प्रकार से विक्रम पुरुषार्थयुक्त किया है। और जगत् के प्रत्येक परमाणु तक में अपने अदृश्य स्वरूप को अन्तर्यामी रूप से वर्तमान कर रक्खा है॥
Footnote
इस मन्त्र को सायणाचार्य ने त्रिविक्रमाज्वतार पर लगाया है। सो निर्मूल है। क्योंकि परमेश्वर अकाय होने से निराकार और क्लेश कर्म विपाकाशयों से छुपा हुआ नहीं है। और निरुक्तकार ने भी इसमें वामनावतार का ग्रहण नहीं किया। जैसा कि निरुक्त १२।१९ “व्यापक विष्णु ने इस सब जगत् को तीन प्रकार के होने को विक्रान्त किया है १ पृथिवी, २ अन्तरिक्ष, ३ द्युलोक, यह शाकपूणि आचार्य का मत है। १ समारोहण, २ विष्णुपद, ३ गयशिर, ये और्णवाभ का मत है। उसका पद अदृश्य हो वा उपमा है कि जैसे रेत में पाँव नहीं दीखता। पांसु रेणु का नाम है क्योंकि वे पांवों से उत्पन्न होती वा पड़ी सोती हैं” इत्यादि॥ गयशिरसि में गय सन्तान का नाम निघण्टु २। १० के अनुसार और शतपथ १४। ७। १। ७ के अनुसार प्राण का नाम भी गय है॥ ऋ० १। २२। १७ और यजुः ५। १५ में “पांसुरे” पाठ है॥