Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 220

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनो जमदग्निर्वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ नो꣢ मित्रावरुणा घृ꣣तै꣡र्गव्यू꣢꣯तिमुक्षतम् । म꣢ध्वा꣣ र꣡जा꣢ꣳसि सुक्रतू ॥२२०॥

आ꣢ । नः꣣ । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । घृतैः꣢ । ग꣡व्यू꣢꣯तिम् । गो । यू꣣तिम् । उक्षतम् । म꣡ध्वा꣢꣯ । र꣡जाँ꣢꣯सि । सु꣣क्रतू । सु । क्रतूइ꣡ति꣢ ॥२२०॥

Mantra without Swara
आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम् । मध्वा रजाꣳसि सुक्रतू ॥

आ । नः । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । घृतैः । गव्यूतिम् । गो । यूतिम् । उक्षतम् । मध्वा । रजाँसि । सुक्रतू । सु । क्रतूइति ॥२२०॥

Samveda - Mantra Number : 220
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
प्रकरण से हे इन्द्र ! राजन् ! (नः) हमारे लिये (सुक्रतू) शोभन कर्म वाले (मित्रावरुणा) सूर्यान्तर्गत वृष्टिहेतु देव (घृतैः) जलों से (गव्यूतिम्) गव्यूति उपलक्षित भूभाग पर्यन्त (मध्वा) मधुर रस से (रजांसि) धरातलों को (आ, उक्षतम्) सीचें॥
अर्थात् हे राजन् ! मानुष प्रबन्ध से सुख देने के अतिरिक्त वरुण और मित्र का यज्ञप्रबन्ध कीजिये जिससे पृथ्वी तल पर भले प्रकार वर्षा हों॥
Footnote
निरुक्त १०। ३॥ १०। २१ निघण्टु १। १२ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ३। ६२। १६ में भी॥