Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 22

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣢स्ति꣣ग्मे꣡न꣢ शो꣣चि꣢षा꣣ य꣢ꣳ स꣣द्वि꣢श्वं꣣ न्या꣢३꣱त्रि꣡ण꣢म् । अ꣣ग्नि꣡र्नो꣢ वꣳसते र꣣यि꣢म् ॥२२॥

अ꣣ग्निः꣢ । ति꣣ग्मे꣡न꣢ । शो꣣चि꣡षा꣢ । यँ꣡ऽस꣢꣯त् । वि꣡श्व꣢꣯म् । नि । अ꣣त्रि꣡ण꣢म् । अ꣣ग्निः꣢ । नः꣣ । वँऽसते । र꣣यि꣢म् ॥२२॥

Mantra without Swara
अग्निस्तिग्मेन शोचिषा यꣳ सद्विश्वं न्या३त्रिणम् । अग्निर्नो वꣳसते रयिम् ॥

अग्निः । तिग्मेन । शोचिषा । यँऽसत् । विश्वम् । नि । अत्रिणम् । अग्निः । नः । वँऽसते । रयिम् ॥२२॥

Samveda - Mantra Number : 22
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्निः) तेजोमय न्यायकारी (तिग्मेन) वज्रतुल्य तीक्ष्ण (शोचिषा) तेज से (विश्वम्) सम्पूर्ण (अत्रिणम्) दुष्ट हिंसक शत्रु को (नियंसत्) निगृहीत करता है (अग्निः) वही (नः) हमारे लिये (रयिम्) धनादि को (बंसते) बांटता है॥
परमात्मा न्यायकारी है इसलिये वह परपीडक दुष्टों को दण्ड देता और धर्मात्माओं को उनके कर्मानुसार धनादि पदार्थ बांटता है।
भौतिक पक्ष में — (अग्निः) तेजोमय अग्नि (तिग्मेन) तीक्ष्ण (शोचिषा) तेज से (विश्वम्) सब (अत्रिणम्) हिंसक शत्रु को (नि-यंसत्) निगृहीत करता है (अग्निः) वही, तब (नः) हमारे लिये (रयिम्) राज्यादि धन को (यंसते) बांटता है॥
मनुष्यों को जानना चाहिए कि अग्नि में तीव्रता है, इसलिए उससे आग्नेयादि अस्त्र शस्त्र बन सकते हैं, उनसे शत्रुओं का निग्रह हो सकता है, इसलिए उसे प्रयुक्त करके अपना जय और परपीडक दुष्ट दस्यु आदि का पराजय करके अपने-अपने उचित परिश्रमानुसार धनादि पदार्थ बांट लेने चाहिएं। इस मन्त्र में तीन बातों की मुख्य शिक्षा है। एक तो यह कि अग्नि की तीव्रता का ज्ञान प्राप्त करो और उससे अस्त्रादि बनाओ, दूसरी यह कि संसार के सभ्य परोपकारक नीतिमान् पुरुषों का विरोध नहीं करना, क्योंकि अपने सुखमोग के लिए पराया राज्यादि धन हरण नहीं करना किन्तु परायी रक्षार्थ, तीसरी बात यह है कि इस प्रकार विजय द्वारा प्राप्त हुए धनादि को योग्यतानुसार बांट करना॥
Footnote
निघण्टु २।२०॥१।१७।२।१०॥ उणादि १।१४६॥ २।१०८।४।६८ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये। ऋग्वेद ६।१६।२८ में यंसत् = यासन्, वंसते = वनते, इतना पाठभेद है॥