Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 216

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢ बु꣣न्दं꣡ वृ꣢त्र꣣हा꣡ द꣢दे जा꣣तः꣡ पृ꣢च्छा꣣द्वि꣢ मा꣣त꣡र꣢म् । क꣢ उ꣣ग्राः꣡ के ह꣢꣯ शृण्विरे ॥२१६॥

आ꣢ । बु꣣न्द꣢म् । वृ꣣त्रहा꣢ । वृ꣣त्र । हा꣢ । द꣣दे । जातः꣢ । पृ꣣च्छात् । वि꣢ । मा꣣त꣡र꣢म् । के । उ꣣ग्राः꣢ । के । ह꣣ । शृण्विरे ॥२१६॥

Mantra without Swara
आ बुन्दं वृत्रहा ददे जातः पृच्छाद्वि मातरम् । क उग्राः के ह शृण्विरे ॥

आ । बुन्दम् । वृत्रहा । वृत्र । हा । ददे । जातः । पृच्छात् । वि । मातरम् । के । उग्राः । के । ह । शृण्विरे ॥२१६॥

Samveda - Mantra Number : 216
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वृत्रहा) शत्रुहा क्षत्रिय (जातः) धनुर्वेद के ज्ञान से प्रसिद्ध हुआ (बुन्दम्) बाण को (आ-ददे) ले और (मातरम्) जननी वा मान्यकर्त्री प्रजा से (वि, पृच्छात्) विविध प्रकार से पूछे कि (के) कौन (उग्राः) उपद्रवी हैं और (ह) प्रसिद्ध (के) कौन (शृण्विरे) विख्यात हैं।
क्षत्रिय को योग्य है कि धनुर्वेद में निष्णात हो कर, धनुष बाण ले, प्रजा से विविध प्रकार से पूछे कि तुम्हें कौन उपद्रवी और विख्यात दस्यु जान पड़ते हैं।
Footnote
निरुक्त ६। ३२ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ८। ४५।४ में “पृच्छत्” पाठान्तर है॥