Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 214

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢ व꣣ इ꣢न्द्रं꣣ कृ꣢विं꣣ य꣡था꣢ वाज꣣य꣡न्तः꣢ श꣣त꣡क्र꣢तुम् । म꣡ꣳहि꣢ष्ठꣳ सिञ्च꣣ इ꣡न्दु꣢भिः ॥२१४॥

आ꣢ । वः꣣ । इ꣢न्द्र꣢꣯म् । कृ꣡वि꣢꣯म् । य꣡था꣢꣯ । वा꣣जय꣡न्तः꣢ । श꣣त꣡क्र꣢तुम् । श꣣त꣢ । क्र꣣तुम् । मँ꣡हि꣢꣯ष्ठम् । सि꣣ञ्चे । इ꣡न्दु꣢꣯भिः । ॥२१४॥

Mantra without Swara
आ व इन्द्रं कृविं यथा वाजयन्तः शतक्रतुम् । मꣳहिष्ठꣳ सिञ्च इन्दुभिः ॥

आ । वः । इन्द्रम् । कृविम् । यथा । वाजयन्तः । शतक्रतुम् । शत । क्रतुम् । मँहिष्ठम् । सिञ्चे । इन्दुभिः । ॥२१४॥

Samveda - Mantra Number : 214
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! मैं परमेश्वर (वः) तुम में (शतक्रतुम्) बहुत अनन्त कर्मवाले (मंहिष्ठम्) अत्यन्त पूजनीय (इन्द्रम्) अपने आत्मा को (आसिञ्चे) सींचता हूँ। दृष्टान्त — (यथा) जैसे (वाजयन्तः) अन्न की उत्पत्ति लोग (इन्दुभिः) जलों से (कृविम्) खेती को सींचते हैं तद्वत्॥
चाहने वाले जैसे अन्न रस आदि देहपुष्टि के लिये कृपक लोग खेत को जल से सींचते हैं इसी प्रकार आत्मा की पुष्टि के लिये पूजनीय अनन्त ज्ञान वा कर्म वाले परमात्मा से हमको हृदय सींचने चाहियें। इसलिये परमात्मा ने मनुष्यों के हृदय को आत्मज्ञान का खेत बनाया है॥
Footnote
निघण्टु १। १२॥ ३। १७ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद १। ३०। १ में “क्रिविम्” पाठ है॥