Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 212

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣मे꣡ त꣢ इन्द्र꣣ सो꣡माः꣢ सु꣣ता꣢सो꣣ ये꣢ च꣣ सो꣡त्वाः꣢ । ते꣡षां꣢ मत्स्व प्रभूवसो ॥२१२

इ꣣मे꣢ । ते꣣ । इन्द्र । सो꣡माः꣢꣯ । सु꣣ता꣡सः꣢ । ये । च꣣ । सो꣡त्वाः꣢꣯ । ते꣡षा꣢꣯म् । म꣣त्स्व । प्रभूवसो । प्रभु । वसो ॥२१२॥

Mantra without Swara
इमे त इन्द्र सोमाः सुतासो ये च सोत्वाः । तेषां मत्स्व प्रभूवसो ॥२१२

इमे । ते । इन्द्र । सोमाः । सुतासः । ये । च । सोत्वाः । तेषाम् । मत्स्व । प्रभूवसो । प्रभु । वसो ॥२१२॥

Samveda - Mantra Number : 212
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) परमेश्वर ! (ये) जो (ते) आपके लिए (सोमाः) मन (सुतासः) शुद्ध किये हैं (च) और जो (सोत्वाः) शुद्ध किये जायेंगे, वे हैं। (प्रभूवसो) हे बहुधन ! (तेषाम्) उनसे (मत्स्व) प्रसन्न हूजिये॥ हे परमात्मन् ! हम मुमुक्षु और आपके जिज्ञासुओं ने यथाशक्ति अपने-अपने मन अन्तःकरण शुद्ध किये हैं और करेंगे। इसलिए हम पर प्रसन्न हूजिये॥
भौतिक पक्ष में— (इन्द्र) मेघवर्षक ! (प्रभूवसो) पुष्कल वास के हेतुभूत ! (ते) तेरे लिए (सोमाः) औषधियां (सुतासः) सम्पादन की हैं (च) और (ये) जो (सोत्वाः) सम्पादित की जायेंगी (तेषाम्) उनसे (मत्स्व) वृद्धि को प्राप्त हो॥
अर्थात् कुछ औषधियाँ ठीक सम्पन्न करके शेष सम्पन्न होती रहें और इन्द्र के उद्देश्य से होम की जावें तो वह हृष्ट अर्थात् दृष्ट्यादि का हेतु होता है॥
Footnote
ऋ० ८। २। १० में केवल “इमे न इन्द्र सोमाः” इतना आरम्भ का पाठ मिलता है, आगे नहीं॥