Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 211

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣पां꣡ फेने꣢꣯न꣣ न꣡मु꣢चेः꣣ शि꣡र꣢ इ꣣न्द्रो꣡द꣢वर्तयः । वि꣢श्वा꣣ य꣡दज꣢꣯य꣣ स्पृ꣡धः꣢ ॥२११॥

अ꣣पा꣢म् । फे꣡ने꣢꣯न । न꣡मु꣢꣯चेः । न । मु꣣चेः । शि꣡रः꣢꣯ । इ꣣न्द्र । उ꣢त् । अ꣣वर्तयः । वि꣡श्वाः꣢꣯ । यत् । अ꣡ज꣢꣯यः । स्पृ꣡धः꣢꣯ ॥२११॥

Mantra without Swara
अपां फेनेन नमुचेः शिर इन्द्रोदवर्तयः । विश्वा यदजय स्पृधः ॥

अपाम् । फेनेन । नमुचेः । न । मुचेः । शिरः । इन्द्र । उत् । अवर्तयः । विश्वाः । यत् । अजयः । स्पृधः ॥२११॥

Samveda - Mantra Number : 211
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) परमेश्वर ! वा वृष्टिकारक इन्द्र ! (अपाम्) जलां की (फेनेन) वृद्धि के सहित वर्तमान (नमुचेः) जल को न छोड़ने वाले मेघ के (शिरः) उन्नताङ्ग को (उदवर्त्तयः) छिन्न करता है (यत्) जबकि (विश्वाः) समस्त (स्पृधः) स्पर्धा करने वाली सेना के समान मेघ की पंक्तियों को (अजयः) जीतता है।
पक्षान्तर में — शतपथ १२। ७। ३। ४ के अनुसार नमुचि पाप का नाम है। पूर्व मन्त्र में लिखे यज्ञ का फल इस मन्त्र में वर्षा होना कहा गया है॥
Footnote
अष्टाध्यायी १। १। ३७ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ८। १४। १३ में भी॥