Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 210

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
धा꣣ना꣡व꣢न्तं कर꣣म्भि꣡ण꣢मपू꣣प꣡व꣢न्तमु꣣क्थि꣡न꣢म् । इ꣡न्द्र꣢ प्रा꣣त꣡र्जु꣢षस्व नः ॥२१०॥

धा꣣ना꣡व꣢न्तम् । क꣣रम्भि꣡ण꣢म् । अ꣣पूप꣡व꣢न्तम् । उ꣣क्थि꣡न꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯ । प्रा꣣तः꣢ । जु꣣षस्व । नः ॥२१०॥

Mantra without Swara
धानावन्तं करम्भिणमपूपवन्तमुक्थिनम् । इन्द्र प्रातर्जुषस्व नः ॥

धानावन्तम् । करम्भिणम् । अपूपवन्तम् । उक्थिनम् । इन्द्र । प्रातः । जुषस्व । नः ॥२१०॥

Samveda - Mantra Number : 210
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे परमात्मन् ! (नः) हमारे (धानावन्तम्) खीलों वाले (करम्भिणम्) दही सत्तू वाले और (प्रातः) प्रातः सवन में (अपूपवन्तम्) सवनीय पुरोडाश [वा पूड़े] वाले और (उक्थिनम्) स्तोत्र वाले को (जुषस्व) प्रीतिपात्र कीजिये।
जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर खील दधि सक्तु पुरोडाश (यज्ञार्थ पाकविशेष) पूडे़ आदि उत्तम सात्त्विक पदार्थों से यज्ञ करते हैं उनसे परमेश्वर प्रसन्न होता है॥
Footnote
ऋ० ३। ५२। १ में भी॥