Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 201

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣मा꣡ उ꣢ त्वा सु꣣ते꣡सु꣢ते꣣ न꣡क्ष꣢न्ते गिर्वणो꣣ गि꣡रः꣢ । गा꣡वो꣢ व꣣त्सं꣢꣫ न धे꣣न꣡वः꣢ ॥२०१॥

इ꣣माः꣢ । उ꣣ । त्वा । सुते꣡सु꣢ते । सु꣣ते꣢ । सु꣣ते । न꣡क्ष꣢꣯न्ते । गि꣣र्वणः । गिः । वनः । गि꣡रः꣢꣯ । गा꣡वः꣢꣯ । व꣣त्स꣢म् । न । धे꣣न꣡वः꣢ ॥२०१॥

Mantra without Swara
इमा उ त्वा सुतेसुते नक्षन्ते गिर्वणो गिरः । गावो वत्सं न धेनवः ॥

इमाः । उ । त्वा । सुतेसुते । सुते । सुते । नक्षन्ते । गिर्वणः । गिः । वनः । गिरः । गावः । वत्सम् । न । धेनवः ॥२०१॥

Samveda - Mantra Number : 201
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(गिर्वणः) वाणी से भजनीय ! परमेश्वर ! (इमाः) ये (गिरः) हमारी वाणियें (सुते सुते) जब-जब सौम्यभाव उत्पन्न होता है तब-तब (त्वा उ) आपको ही (नक्षन्ते) प्राप्त होती हैं। स्नेह में दृष्टान्त — (न) जैसे (धेनवः) दुधार (गावः) गौवें (वत्सम्) प्यारे बछड़े को ही प्राप्त हो जाती हैं।
जैसे गौवें प्यार के वशीभूत हुई जंगल में जहाँ-तहाँ घूम कर जब दूध देने का समय आता है तब-तब प्यारे बछड़े के ही समीप पहुँचती है। इसी प्रकार अनन्त आनन्द का सागर होने से प्रीतिपात्र परमात्मा को प्रत्येक मनुष्य की वाणी पुकारने लगती है, जब जब कि वह एकान्त में बैठ, राग द्वेषादि छोड़, हृदय में सौम्य शांतभाव उत्पन्न करता है॥
Footnote
निघं० २। १८ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ६।४५।२८॥