Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 200

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रो꣢ अ꣣ङ्ग꣢ म꣣ह꣢द्भ꣣य꣢म꣣भी꣡ षदप꣢꣯ चुच्यवत् । स꣢꣫ हि स्थि꣣रो꣡ विच꣢꣯र्षणिः ॥२००॥

इ꣡न्द्रः꣢꣯ । अ꣣ङ्ग꣢ । म꣣ह꣢त् । भ꣣य꣢म् । अ꣣भि꣢ । सत् । अ꣡प꣢꣯ । चु꣣च्यवत् । सः꣢ । हि । स्थि꣣रः꣢ । वि꣡च꣢꣯र्षणिः । वि । च꣣र्षणिः ॥२००॥

Mantra without Swara
इन्द्रो अङ्ग महद्भयमभी षदप चुच्यवत् । स हि स्थिरो विचर्षणिः ॥

इन्द्रः । अङ्ग । महत् । भयम् । अभि । सत् । अप । चुच्यवत् । सः । हि । स्थिरः । विचर्षणिः । वि । चर्षणिः ॥२००॥

Samveda - Mantra Number : 200
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अंग) हे प्रिय जिज्ञासो (इन्द्रः) परमेश्वर और सूर्यलोक (अभीषत्) सब ओर से प्राप्त हुए (महद्भयम्) बड़े भय को (अपचुच्यवत्) भगाता है। (हि) क्योंकि (सः) वह (स्थिरः) कूटस्थ वा अपनी परिधि में स्थित (विचर्षणिः) ज्ञानदृष्टि वा भौतिक दृष्टि का दाता है। निघण्टु ३। ११॥
परमात्मा कृपा करके मुमुक्षु के संसरण भय को दूर करता और ज्ञान से मुक्ति देता है। सूर्य भी अन्धकार भय को हटाकर सबको दिखाता है और अपनी परिधि में स्थिर है॥
Footnote
ऋग्वेद २। ४१। १०॥