Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 20

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢꣫दित्प्र꣣त्न꣢स्य꣣ रे꣡त꣢सो꣣ ज्यो꣡तिः꣢ पश्यन्ति वास꣣र꣢म् । प꣣रो꣢꣫ यदि꣣ध्य꣡ते꣢ दि꣣वि꣢ ॥२०॥

आ꣢त् । इत् । प्र꣣त्न꣡स्य꣢ । रे꣡त꣢꣯सः । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । प꣣श्यन्ति । वासर꣢म् । प꣣रः꣢ । यत् । इ꣣ध्य꣡ते꣢ । दि꣣वि꣢ ॥२०॥

Mantra without Swara
आदित्प्रत्नस्य रेतसो ज्योतिः पश्यन्ति वासरम् । परो यदिध्यते दिवि ॥

आत् । इत् । प्रत्नस्य । रेतसः । ज्योतिः । पश्यन्ति । वासरम् । परः । यत् । इध्यते । दिवि ॥२०॥

Samveda - Mantra Number : 20
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(आत् इत्) यह भी कि (यत्) जो (परः) अतिशयित (दिवि) द्युलोक में (इध्यते) चमकता है [सूर्य से तात्पर्य है] जिसको (वासरम्) दिन भर (पश्यन्ति) देखते हैं, उसमें भी (प्रत्नस्य) सनातन (रेतसः) सामर्थ्यवान परमात्मा की (ज्योतिः) ज्योति है
अर्थात् जिस प्रकार सोना चान्दी पीतल आदि पदार्थ सूर्य की ज्योति की सहायता से प्रकाशित होते हैं, इसी प्रकार सूर्य स्वयं भी परमात्मा की ज्योति से प्रकाशित होता है। जैसा कि श्वेताश्वतरोपदिषद् वाक्य (६। १४) संस्कृतभाष्य पृष्ठ ५१ में लिख आये हैं कि “न वहाँ सूर्य चमकता है, न चन्द्र, न तारे, न ये बिजुलियाँ चमकतीं, फिर यह अग्नि कहाँ ! किन्तु उसी की चमक से लौटे हुए प्रकाश से सब कुछ अनु प्रकाशित है, उसी की चमक से यह सब चमकता है॥”
भौतिक पक्ष में:— (आत्, इत्) यह, भी कि (यत्) जो (परः) अत्यन्त (दिवि) आकाश में (इध्यते) चमकता है [सूर्य], जिसे (वासरम्) दिन भर (पश्यन्ति) देखते हैं, उसमें भी (प्रत्नस्य) नित्यस्वरूप (रेतसः) वीर्यवान् कारणाग्नि का ही (ज्योतिः) प्रकाश है॥
अर्थात् कारण रूप अग्नि तत्त्व जो नित्य है उसी से सूर्यादि प्रकाशक लोक भी प्रकाशित हैं। इसमें एक बात यह निकलती है कि सूर्य का प्रकाश अत्यन्त है, दूसरी यह कि सूर्य से दिन बनता है, तीसरी यह कि कारणाग्नि से सूर्य बना है।
Footnote
निघं० ३। २७॥ १। ६॥ उणादि ४। २०२ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये। ऋग्वेद ८। ६। ३० में “दिवि” के स्थान में “दिवा” यह पाठभेद है॥ १०॥