Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 2

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
त्व꣡म꣢ग्ने य꣣ज्ञा꣢ना꣣ꣳ हो꣢ता꣣ वि꣡श्वे꣢षाꣳ हि꣣तः꣢ । दे꣣वे꣢भि꣣र्मा꣡नु꣢षे꣣ ज꣡ने꣢ ॥२॥

त्व꣢म् । अ꣣ग्ने । यज्ञा꣡ना꣢म् । हो꣡ता꣢꣯ । वि꣡श्वे꣢꣯षाम् । हि꣣तः꣢ । दे꣣वे꣡भिः꣢ । मा꣡नु꣢꣯षे । ज꣡ने꣢꣯ ॥२॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने यज्ञानाꣳ होता विश्वेषाꣳ हितः । देवेभिर्मानुषे जने ॥

त्वम् । अग्ने । यज्ञानाम् । होता । विश्वेषाम् । हितः । देवेभिः । मानुषे । जने ॥२॥

Samveda - Mantra Number : 2
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
[ अग्ने] हे अग्ने ! तुम (विश्वेषाम् ) सब (यज्ञानाम्) अग्निष्टोमादि कर्म यज्ञों के (होता) होम करने वाले (देवेभिः) विद्वान् ऋत्विजों द्वारा (मानुषे, जने) यजमान के यहां (हितः) स्थापन किये जाते हो ॥
भाषार्थ:— स्पष्ट है कि अग्नि ही सब यज्ञों का होता है, वही हव्य पदार्थों को होमता = फूंकता है. उसे ही होता उद्गाता अध्वर्यु आदि ऋत्विज् लोग यजमान के घर कुण्ड में स्थापित करते हैं सो करें ।
ईश्वर विषय में:— (अग्ने) हे प्रकाशमान ! तुम (विश्वेषाम् ) समस्त (यज्ञानाम्) ब्रह्मयज्ञादि ज्ञानयज्ञों के (होता) ग्रहण करने वाले यज्ञस्वामी हो, तुम (देवेभिः) विद्वान् उपासकों से ( मानुषे, जने) मनुष्य वर्ग में (हितः) धारण किये जाते हो ॥
इस से विदित कराया गया है कि परमात्मा सब ज्ञानयज्ञों का स्वामी अधिष्ठाता है, सब मनुष्यों में वे मनुष्य जो उपासक हैं उस का ध्यान करते हैं सो करें ।
Footnote
यह ऋचा भी ऋग्वेद (६ । १६ । १) में ज्यों की त्यों है ॥