Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 196

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
स꣡दा꣢ व꣣ इ꣢न्द्र꣣श्च꣡र्कृ꣢ष꣣दा꣢꣫ उपो꣣ नु꣡ स स꣢꣯प꣣र्य꣢न् । न꣢ दे꣣वो꣢ वृ꣣तः꣢꣫ शूर꣣ इ꣡न्द्रः꣢ ॥१९६

स꣡दा꣢꣯ । वः꣣ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । च꣡र्कृ꣢꣯षत् । आ । उ꣡प꣢꣯ । उ꣣ । नु꣢ । सः । स꣣पर्य꣢न् । न । दे꣣वः꣢ । वृ꣣तः꣢ । शू꣡रः꣢꣯ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ ॥१९६॥

Mantra without Swara
सदा व इन्द्रश्चर्कृषदा उपो नु स सपर्यन् । न देवो वृतः शूर इन्द्रः ॥१९६

सदा । वः । इन्द्रः । चर्कृषत् । आ । उप । उ । नु । सः । सपर्यन् । न । देवः । वृतः । शूरः । इन्द्रः ॥१९६॥

Samveda - Mantra Number : 196
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे मित्रो ! (सः) वह (इन्द्रः) परमात्मा (वः) तुम्हें (सदा) सर्वदा (उप, उ,) समीप ही वर्तमान (आ, चकृषत्) आकर्षित करता है। (न) जैसे (सपर्यन्) सत्कार करता हुआ। (नु) परन्तु (इन्द्रः) परमेश्वर (शूरः) निर्भय (देवः) प्रकाशक हैं ऐसा (वृतः) भक्तिपूर्वक स्वीकार किया हो तब॥
Footnote
जो लोग परमेश्वर को निर्भय प्रकाशक जान कर भक्ति से उनका वरण करते हैं, उनके हृदय में सदा समीपता से वर्तमान परमेश्वर उन को अपने समीप आकर्षित करता है, मोक्ष देता है॥