Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 190

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
क꣢ इ꣣मं꣡ नाहु꣢꣯षी꣣ष्वा꣢꣫ इन्द्र꣣ꣳ सो꣡म꣢स्य तर्पयात् । स꣢ नो꣣ व꣢सू꣣न्या꣡ भ꣢रात् ॥१९०

कः꣢ । इ꣣म꣢म् । ना꣡हु꣢꣯षीषु । आ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । सो꣡म꣢꣯स्य । त꣣र्पयात् । सः꣢ । नः꣣ । व꣡सू꣢꣯नि । आ । भ꣣रात् ॥१९०॥

Mantra without Swara
क इमं नाहुषीष्वा इन्द्रꣳ सोमस्य तर्पयात् । स नो वसून्या भरात् ॥१९०

कः । इमम् । नाहुषीषु । आ । इन्द्रम् । सोमस्य । तर्पयात् । सः । नः । वसूनि । आ । भरात् ॥१९०॥

Samveda - Mantra Number : 190
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(कः) परमेश्वर (नाहुषीषु) मानुषी प्रजाओं के निमित्त (इमम्) इस (इन्द्रम्) वर्षाने वाले को (सोमस्य) सोम से (तर्पयात्) तृप्त करे (सः) वह इन्द्र (नः) हमारे लिये (वसूनि) धन धान्यादि (आभरात्) प्राप्त कराये॥
परमात्मा ऐसी कृपा करे कि वृष्टिकारक विद्युत् सोम से तृप्त अर्थात् पूर्ण आप्यायित हो, जिससे वह वृष्टि द्वारा धान्यादि का वधैक हो।
Footnote
निघण्टु २। ३ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥