Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 19

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रयोगो भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣡मि꣢न्धा꣣नो꣡ मन꣢꣯सा꣣ धि꣡य꣢ꣳ सचेत꣣ म꣡र्त्यः꣢ । अ꣣ग्नि꣡मि꣢न्धे वि꣣व꣡स्व꣢भिः ॥१९॥

अ꣣ग्नि꣢म् । इ꣣न्धानः꣢ । म꣡न꣢꣯सा । धि꣡य꣢꣯म् स꣣चेत । म꣡र्त्यः꣢꣯ । अ꣣ग्नि꣢म् । इ꣣न्धे । वि꣣व꣡स्व꣢भिः । वि꣣ । व꣡स्व꣢भिः ॥१९॥

Mantra without Swara
अग्निमिन्धानो मनसा धियꣳ सचेत मर्त्यः । अग्निमिन्धे विवस्वभिः ॥

अग्निम् । इन्धानः । मनसा । धियम् सचेत । मर्त्यः । अग्निम् । इन्धे । विवस्वभिः । वि । वस्वभिः ॥१९॥

Samveda - Mantra Number : 19
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(मर्त्यः) मनुष्य (मनसा) श्रद्धा से (अग्निम् इन्धानः) परमात्मा का ध्यान करता हुआ (धियम्) बुद्धि को (सचेत) अच्छे प्रकार प्राप्त हो, इसलिये (विवस्वमिः) सूर्य किरणों के साथ (अग्निम्) परमेश्वर को (इन्धे) हृदय में विराजित करे।
अर्थात् परमात्मा की उपासना “तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्” इत्यादि मन्त्रों से करने वाला मनुष्य बुद्धि को प्राप्त करता है। इसलिये उसे चाहिये कि सूर्य की किरणों के साथ ही [प्रातः ही] परमात्मा की उपासना करे। “मर्त्य” पद से यह दिखलाया है कि मनुष्य मरणधर्मा है और मृत्यु से बचना चाहता है तो परमात्मा की उपासना करे। उसका फल मन्त्र में यह सुझाया है कि बुद्धि बढ़ती है। बुद्धि बढ़ने से मिथ्याज्ञान निवृत्त होता है, मिथ्याज्ञान की निवृत्ति से “दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः” न्यायदर्शन सू० २ के अनुसार मोक्ष होने से मर्त्य = मनुष्य का मृत्यु छूट जाता है। “मनसा” पद इसलिये है कि मन से अर्थात् श्रद्धा से उपासना करे, न कि देखाने के लिये दम्भमात्र। “इन्धानः” का ठीक अर्थ “सुलगाता हुआ” है, सो ध्यान करके परमात्मा को हृदय में प्रकाशमान करना ही हृदयकुण्ड में ज्योतिःस्वरूप अग्नि परमात्मा का सुलगाना हैं। सूर्य किरणों के साथ प्रातः होते ही तमोगुण वा अन्धकार क्षीण होता है और ज्ञान वा प्रकाश की उन्नति होती है इसलिये उस प्रातःकाल को विशेष करके उपासना का काल ठहराया गया है॥
भौतिक पक्ष में—(मर्त्यः) मनुष्य (मनसा) जी लगाकर (अग्निम्, इन्धान:) अग्नि को, प्रदीप्त करता हुआ (धियम्) कर्म को (सचेत) संप्राप्त हो, इसलिये (विवस्वभिः) सूर्य की किरणों की सहायता से (अग्निम्) अग्नि को (इन्धे) सुलगावे॥
इसमें मुख्य करके दो बातों का ज्ञानोपदेश है। एक तो यह कि मनुष्य अग्नि को प्रदीप्त करता हुआ कर्म को प्राप्त हो, इससे यह शिक्षा है कि यज्ञ शिल्प युद्ध आदि समस्त कर्त्तव्य कर्मकाण्ड की सिद्धि अग्नि द्वारा होती है। यथार्थ में अग्नि का गुण प्रकाश ही प्राणियों को विशेष करके कर्म में प्रवृत्त करता है, अन्धकार में सब कर्म बन्द होना चाहते हैं, रात्रि में कर्म करने वालों को अग्नि के प्रकाश की आवश्यकता होती है। दूसरी बात यह कि सूर्यकिरणों की सहायता से मनुष्य अग्नि का प्रदीप्त करता है, जब शीत ऋतु में सूर्य की किरणें अधिक तीव्र नहीं पड़तीं तब उतना ही अग्नि का बल घट जाता है, ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की प्रचण्डता के साथ आहवनीयादि अग्नि में कैसी तीव्रता हो जाती है, जिससे स्पष्ट है कि अग्नि के प्रदीप्त वा उद्बुद्ध होने के लिये सूर्यकिरणों की सहायता अपेक्षित है। जिसको जान कर मनुष्य नाना प्रकार अग्निसम्बन्धी कार्य सिद्ध कर सुख पा सकते हैं।
Footnote
निघण्टु ३। ९ और ३। १ के प्रमाण संस्कृतभाष्य से देखिये। तथा तीसरी बात इस मन्त्र में यह भी दिखाई गई है कि होम का काल नित्य प्रातःकाल है। क्योंकि इसमें कहा गया है कि “सूर्यकिरणों के साथ”॥ ऋग्वेद ८। ६१। २२ में केवल “इन्वे” के स्थान में “ईधे” इतना पाठभेद है॥