Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1873

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- जय ऐन्द्रः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मृ꣣गो꣢꣫ न भी꣣मः꣡ कु꣢च꣣रो꣡ गि꣢रि꣣ष्ठाः꣡ प꣢रा꣣व꣢त꣣ आ꣡ ज꣢गन्था꣣ प꣡र꣢स्याः । सृ꣣क꣢ꣳ स꣣ꣳशा꣡य꣢ प꣣वि꣡मि꣢न्द्र ति꣣ग्मं꣡ वि शत्रू꣢꣯न् ताढि꣣ वि मृधो꣢꣯ नुदस्व ॥१८७३॥

मृ꣣गः꣢ । न । भी꣣मः꣢ । कु꣣चरः꣢ । गि꣣रिष्ठाः꣢ । गि꣣रि । स्थाः꣢ । प꣣राव꣡तः꣢ । आ । ज꣣गन्थ । प꣡र꣢꣯स्याः । सृ꣣क꣢म् । स꣣ꣳशा꣡य꣢ । स꣣म् । शा꣡य꣢꣯ । प꣣वि꣢म् । इ꣣न्द्र । तिग्म꣢म् । वि । श꣣त्रू꣢꣯न् । ता꣢ढि । वि꣢ । मृ꣡धः꣢꣯ । नु꣣दस्व ॥१८७३॥

Mantra without Swara
मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः परावत आ जगन्था परस्याः । सृकꣳ सꣳशाय पविमिन्द्र तिग्मं वि शत्रून् ताढि वि मृधो नुदस्व ॥

मृगः । न । भीमः । कुचरः । गिरिष्ठाः । गिरि । स्थाः । परावतः । आ । जगन्थ । परस्याः । सृकम् । सꣳशाय । सम् । शाय । पविम् । इन्द्र । तिग्मम् । वि । शत्रून् । ताढि । वि । मृधः । नुदस्व ॥१८७३॥

Samveda - Mantra Number : 1873
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 21; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) राजन् ! आप (मृगः न) सिंह के समान (भीमः) शत्रु को भयदायक (कुचरः) पृथिवी पर विचरने वाले (गिरिष्ठाः) पर्वतस्थ वा दुर्ग = किले में स्थित (परस्याः) अन्य दिशा से (परावतः) दूर से (आजगन्थ) आते हो और आकर (सृकम्) चलाऊ (तिग्मम्) तीक्ष्ण (पविम्) वज्र को (संशय) भले प्रकार से पैना कर, तेज करके (शत्रून्) अधर्मी दुष्ट दस्युओं को (वि—ताढि) विशेष करके ताड़ित करो और (मृधः) युद्ध करते हुए दुष्टों को (वि-नुदस्व) विशेष करके दूर भगाओ॥
Footnote
ज्वालाप्रसाद भार्गव आष्यकार की धृष्टता पर आश्चर्य होता है कि उन्होंने इस मन्त्र के व्याख्यान में मूलविरुद्ध निर्मूल नृसिंहादि अवतारों का वर्णन कर डाला॥
न तो संस्कृतभाष्य में लिखे निरुक्त १। २० में अवतार का वर्णन है। न ऋग्वेद १०। १८०। २ में सायणाचार्य ने अवतार बताये। न महीघर ने यजुर्वेद १८। ७१ में अवतारपरक व्याख्या की, और न ही अथर्ववेद ७। ८४। ३ में आये इस मन्त्र पर सायणाचार्य ने अवतार की चर्चा तक की है॥