Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 186

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ग꣣व्यो꣢꣫ षु णो꣣ य꣡था꣢ पु꣣रा꣢श्व꣣यो꣡त र꣢꣯थ꣣या꣢ । व꣣रिवस्या꣢ म꣣हो꣡ना꣢म् ॥१८६॥

ग꣣व्य꣢ । उ꣣ । सु꣢ । नः꣣ । य꣡था꣢꣯ । पु꣣रा꣢ । अ꣣श्वया꣢ । उ꣣त꣢ । र꣣थया꣢ । व꣣रिवस्या꣢ । म꣣हो꣡ना꣢म् ॥१८६॥

Mantra without Swara
गव्यो षु णो यथा पुराश्वयोत रथया । वरिवस्या महोनाम् ॥

गव्य । उ । सु । नः । यथा । पुरा । अश्वया । उत । रथया । वरिवस्या । महोनाम् ॥१८६॥

Samveda - Mantra Number : 186
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्य ! तू (यथा पुरा) पूर्व के समान (नः) हमारी (गव्या) गौ की इच्छा (उ) और (अश्वया) घोड़े की इच्छा (उत) और (रथया) रथ की इच्छा और (महोनाम्) सत्कारार्ह धनों की इच्छा से इन्द्र परमेश्वर को (सु, वरिवस्य) सेवित कर॥
मनुष्यों को परमात्मा की सेवा भक्ति से गौ घोड़े रथ धन धान्यादि सर्व सुखभोग की इच्छा करनी चाहिये॥
Footnote
अष्टाध्यायी [वा] ३। १। ८॥ ७। ४। ३५॥ ७। १। ३४ इत्यादि के प्रमाण तथा ऋ० ८। ४६। ९ के पाठ का अन्तर संस्कृतभाष्य में देखिये॥