Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1849

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- अप्रतिरथ ऐन्द्रः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ꣣शुः꣡ शिशा꣢꣯नो वृष꣣भो꣢꣫ न भी꣣मो꣡ घ꣢नाघ꣣नः꣡ क्षोभ꣢꣯णश्चर्षणी꣣ना꣢म् । स꣣ङ्क्र꣡न्द꣢नोऽनिमि꣣ष꣡ ए꣢कवी꣣रः꣢ श꣣त꣢ꣳ सेना꣢꣯ अजयत्सा꣣क꣡मिन्द्रः꣢꣯ ॥१८४९॥

आ꣣शुः꣢ । शि꣡शा꣢꣯नः । वृ꣣षभः꣢ । न । भी꣣मः꣢ । घ꣣नाघनः꣢ । क्षो꣡भ꣢꣯णः । च꣣र्षणीना꣢म् । सं꣣क्र꣡न्द꣢नः । स꣣म् । क्र꣡न्द꣢꣯नः । अ꣣निमिषः꣢ । अ꣢ । निमिषः꣢ । ए꣣कवीरः꣢ । ए꣣क । वीरः꣢ । श꣣त꣢म् । से꣡नाः꣢꣯ । अ꣣जयत् । साक꣢म् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ ॥१८४९॥

Mantra without Swara
आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम् । सङ्क्रन्दनोऽनिमिष एकवीरः शतꣳ सेना अजयत्साकमिन्द्रः ॥

आशुः । शिशानः । वृषभः । न । भीमः । घनाघनः । क्षोभणः । चर्षणीनाम् । संक्रन्दनः । सम् । क्रन्दनः । अनिमिषः । अ । निमिषः । एकवीरः । एक । वीरः । शतम् । सेनाः । अजयत् । साकम् । इन्द्रः ॥१८४९॥

Samveda - Mantra Number : 1849
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 21; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
इन्द्र = राजा का वर्णन करते हैं — (इन्द्रः) इन्द्रदेव (आशुः) शीघ्रकारी फुरतीला (शिशानः) तीक्ष्ण (वृषभः न भीमः) सांड के समान डरावना (धनाधनः) प्रहार करने में चतुर (चर्षणीनां क्षोभणः) मनुष्यों के मध्य में क्षोभ वाला (संक्रन्दनः) विधिपूर्वक शत्रु पर प्रहार करने वाला (अनिमिषः) आलस्यप्रमादरहित (एकवीरः) अद्वितीय शूरवीर (शतं सेनाः) असंख्य सेनाओं को (साकम्) एक साथ (अजयत्) जीतता है॥
Footnote
मध्यस्थान देवगणान्तर्गत इन्द्र सब देवों का राजा है, वह राजसी शक्ति वाला है, मनुष्यों में भी जिन-जिन में ऊपर कहे मन्त्र के गुण होते हैं वे सब भी इन्द्रतत्त्व की प्रधान सहायता और प्रसाद से होते हैं, उन्हीं गुणों से राजा, राजा का सेनापति और शूरवीर राजपुरुष इन्द्रपदवाच्य होता है, जहां तक उसमें इन्द्रत्व हो उतने अंश में यह बात चरितार्थ होती है।
कर्मकाण्ड विषय में विवरणकार कहते हैं कि “अब साग्निचित्य क्रतु में ब्रह्मा अप्रतिरथ का जप करे। इस कथन वाला ब्रह्मापन त्रयी विद्या से किया जाता है। इस कारण से उद्गात्रों को भी मास की परिसमाप्ति से ब्रह्मापन माना गया है। इस कारण सब शाखाओं में अप्रतिरथ पढ़ा जाता है। सब (अप्रतिरथ) का इन्द्र देवता प्रजापति ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है”।
सायणाचार्य कहते हैं कि “यहां ऐन्द्र अप्रतिरथ ऋषि, त्रिष्टुप छन्द और इन्द्र देवता है। साग्निचित्य क्रतु में अग्निप्रणयन के समय ब्राह्मण को यह अध्याय जपना चाहिये”।
श्रीमान् स्वामी दयानन्दसरस्वती जी यजुर्वेदभाष्य में कहते हैं कि “अब सेनापति के कृत्य बताते हैं”।
ऋ० १०। १०३। १ यजुर्वेद १७। ३३ में भी है॥