Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 184

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- उलो वातायनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
वा꣢त꣣ आ꣡ वा꣢तु भेष꣣ज꣢ꣳ श꣣म्भु꣡ म꣢यो꣣भु꣡ नो꣢ हृ꣣दे꣢ । प्र꣢ न꣣ आ꣡यू꣢ꣳषि तारिषत् ॥१८४॥

वा꣡तः꣢꣯ । आ । वा꣢तु । भेषज꣢म् । शं꣣म्भु꣢ । श꣣म् । भु꣢ । म꣣योभु꣢ । म꣣यः । भु꣢ । नः꣣ । हृदे꣢ । प्र । नः꣣ । आ꣡यूँ꣢꣯षि । ता꣣रिषत् ॥१८४॥

Mantra without Swara
वात आ वातु भेषजꣳ शम्भु मयोभु नो हृदे । प्र न आयूꣳषि तारिषत् ॥

वातः । आ । वातु । भेषजम् । शंम्भु । शम् । भु । मयोभु । मयः । भु । नः । हृदे । प्र । नः । आयूँषि । तारिषत् ॥१८४॥

Samveda - Mantra Number : 184
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे इन्द्र ! राजन् ! वा परमात्मन् ! (नः) हमारे (हृदे) हृदय के लिये (शम्भु) रोगशमनकारक (मयोभु) सुखदायक (भेषजम्) प्रौषध को (वातः) वायु (आवातु) बहावे और (नः) हमारी (प्रायूंषि) आयुत्रों को (प्र, तारिषत्) बढ़ावे॥
राजा के सुप्रबन्ध और परमात्मा की कृपा से वायु की शुद्धि द्वारा मनुष्यों को औषध तुल्य वायु सेवन करने से बल नीरोगता दीर्घायुष्कता और सुख प्राप्त होता है॥
Footnote
ऋ० १०। १८६। १॥