Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1839

1875 Mantra
Devata- आपः Rishi- त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः सिन्धुद्वीप आम्बरीषो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त꣢स्मा꣣ अ꣡रं꣢ गमाम वो꣣ य꣢स्य꣣ क्ष꣡या꣢य꣣ जि꣡न्व꣢थ । आ꣡पो꣢ ज꣣न꣡य꣢था च नः ॥१८३९॥

त꣡स्मै꣢꣯ । अ꣡र꣢꣯म् । ग꣣माम । वः । य꣡स्य꣢꣯ । क्ष꣡या꣢꣯य । जि꣡न्व꣢꣯थ । आ꣡पः꣢꣯ । ज꣣न꣡य꣢थ । च꣣ । नः ॥१८३९॥

Mantra without Swara
तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ । आपो जनयथा च नः ॥

तस्मै । अरम् । गमाम । वः । यस्य । क्षयाय । जिन्वथ । आपः । जनयथ । च । नः ॥१८३९॥

Samveda - Mantra Number : 1839
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(आपः) जलो ! तुम (यस्य) जिस अशुद्धयादि पाप के (क्षयाय) नाशार्थ (वः) तुम को, हम (अरम्) पूर्णतया (गमाम) प्राप्त करते हैं (तस्मै) उस अशुद्धयादि नाश के लिए (जिन्वथ) प्रसन्न तृप्त करो (च) और (नः) हम विधिपूर्वक जल का सेवन करने वालों को (जनयथ) उत्पन्न करो, सन्तानों से बढ़ाओ॥
जो मनुष्य विधिपूर्वक जल का सेवन करते हैं, वे सर्वाङ्गशुद्ध नीरोग होते हुए पुत्रादि सन्तति से बढ़ते हैं।
Footnote
ऋ० १०। ९। ३ तथा यजुर्वेद ११। ५२ में भी॥