Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1832

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु꣡न꣢रू꣣र्जा꣡ नि व꣢꣯र्तस्व꣣ पु꣡न꣢रग्न इ꣣षा꣡यु꣢षा । पु꣡न꣢र्नः पा꣣ह्य꣡ꣳह꣢सः ॥१८३२॥

पु꣡नः꣢꣯ । ऊ꣣र्जा꣢ । नि । व꣣र्तस्व । पु꣡नः꣢꣯ । अ꣣ग्ने । इषा꣢ । आ꣡यु꣢꣯षा । पु꣡नः꣢꣯ । नः꣣ । पाहि । अ꣡ꣳह꣢꣯सः ॥१८३२॥

Mantra without Swara
पुनरूर्जा नि वर्तस्व पुनरग्न इषायुषा । पुनर्नः पाह्यꣳहसः ॥

पुनः । ऊर्जा । नि । वर्तस्व । पुनः । अग्ने । इषा । आयुषा । पुनः । नः । पाहि । अꣳहसः ॥१८३२॥

Samveda - Mantra Number : 1832
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
अग्निहोत्र नित्य करने का फल — (अग्ने) अग्नि ! (पुनः) बारम्बार (ऊर्जाः) दुग्ध घृतादि रस के साथ (निवर्त्तस्व) हमको अभिमुख करके आवे (इषा) अन्न यव गोधूमादि (आयुषा) आयु के रक्षक वा प्राणों के रक्षक के साथ (पुनः) बारम्बार प्राप्त होवे। (पुनः) बारम्बार (नः) हम यजमानों को (अंहसः) पापरोगादि शत्रु से (पाहि) बचावे॥
Footnote
यजुर्वेद १२। ९ तथा १२। ४० में भी॥