Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1831

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣢꣫र्ज्योति꣣र्ज्यो꣡ति꣢र꣣ग्नि꣢꣫रिन्द्रो꣣ ज्यो꣢ति꣣र्ज्यो꣢ति꣣रि꣡न्द्रः꣢ । सू꣢र्यो꣣ ज्यो꣢ति꣣र्ज्यो꣢तिः꣣ सू꣡र्यः꣢ ॥१८३१

अ꣣ग्निः꣢ । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । अ꣣ग्निः꣢ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । सू꣡र्यः꣢꣯ । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । सू꣡र्यः꣢꣯ ॥१८३१॥

Mantra without Swara
अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निरिन्द्रो ज्योतिर्ज्योतिरिन्द्रः । सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः ॥१८३१

अग्निः । ज्योतिः । ज्योतिः । अग्निः । इन्द्रः । ज्योतिः । ज्योतिः । इन्द्रः । सूर्यः । ज्योतिः । ज्योतिः । सूर्यः ॥१८३१॥

Samveda - Mantra Number : 1831
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्निः) अग्नि (ज्योतिः) ज्योतिरूप है, काष्ठादि रूप नहीं। (ज्योतिः) ज्योति (अग्निः) अग्निरूप है, तद्भिन्न नहीं। (इन्द्रः) अन्तरिक्षस्थान देवगणान्तर्गत वायुविशेष वा विद्युद्विशेष इन्द्र (ज्योतिः) एक प्रकार का प्रकाश है (ज्योतिः) वह ज्योति (इन्द्रः) इन्द्र कहाता है। (सूर्यः) सूर्यलोक (ज्योतिः) प्रत्यक्ष ज्योतिरूप है (ज्योतिः) वह ज्योति (सूर्य) सूर्य कहाता है॥ इस मन्त्र में इन्द्र सूर्य और ज्योति की एकात्मता बताई गई है॥
Footnote
यजुर्वेद ३। ९ में भी पाठभेद से यह ऋचा पाई जाती है, वहां भाष्यकार महीघर कहते हैं कि “यहां से आरम्भ करके ‘उपप्रयन्तः’ से पूर्व अग्निहोत्र होम के मन्त्र हैं। सामान्य से इन मन्त्रों का प्रजापति ऋषि है परन्तु जहां अनुक्रमणीकारों ने ऋषिविशेष कहा है वहां दोनों भी ऋषि समझने चाहियें (एक अनुक्रमणीकारोक्त दूसरा प्रजापति सामान्य से)” इत्यादि॥