Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 183

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनः शेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣य꣡मु꣢ ते꣣ स꣡म꣢तसि क꣣पो꣡त꣢ इव गर्भ꣣धि꣢म् । व꣢च꣣स्त꣡च्चि꣢न्न ओहसे ॥१८३॥

अ꣣य꣢म् । उ꣣ । ते । स꣢म् । अ꣣तसि । कपो꣡तः꣢ । इ꣣व । गर्भधि꣣म् । ग꣣र्भ । धि꣢म् । व꣡चः꣢꣯ । तत् । चि꣣त् । नः । ओहसे ॥१८३॥

Mantra without Swara
अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम् । वचस्तच्चिन्न ओहसे ॥

अयम् । उ । ते । सम् । अतसि । कपोतः । इव । गर्भधिम् । गर्भ । धिम् । वचः । तत् । चित् । नः । ओहसे ॥१८३॥

Samveda - Mantra Number : 183
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे इन्द्र ! राजन् ! (ते) आपका (अयम्) यह प्रजाजन (उ) भी (गर्भधिम्) गर्भधारिणी कबूतरी को (कपोत इव) कबूतर के समान कामना करता हुआ (समतसि) प्राप्त होता है। (तत्) इस कारण (नः) हम प्रजाजनों के (वचः) प्रार्थना को (चित्) भी (ओहसे) प्राप्त हूजिये, सुनिये॥
कबूतर स्वाभाविक अत्यन्त कामी होता है। जैसा कबूतर को कबूतरी में अत्यन्त अनुराग होता है, वैसे ही न्यायपरायण राजा में प्रजा को अत्यन्त अनुराग होता है, होना चाहिये। ऐसा होता है तब राजा अवश्य प्रजा की पुकार सुनता है॥
अथवा — इन्द्र ! हे परमात्मन् ! (ते) आपका (अयम् उ) यह प्राणी भी (गर्भधिम्) गर्भवास रूप समुद्र को (कपोत इव) जल की नौका के समान (समतसि) निरन्तर प्राप्त होता है (तत्) इससे (चित्) भी (नः) हम प्राणियों की (वचः) पुकार को (ओहसे) प्राप्त हूजिये वा सुनिये॥
Footnote
ऋग्वेद १। ३०।४॥