Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1827

1875 Mantra
Devata- विश्वे देवाः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣡र्जा꣢गार꣣ त꣡मृचः꣢꣯ कामयन्ते꣣ऽग्नि꣡र्जा꣢गार꣣ त꣢मु꣣ सा꣡मा꣢नि यन्ति । अ꣣ग्नि꣡र्जा꣢गार꣣ त꣢म꣣य꣡ꣳ सोम꣢꣯ आह꣣ त꣢वा꣣ह꣡म꣢स्मि स꣣ख्ये꣡ न्यो꣢काः ॥१८२७॥

अ꣣ग्निः꣢ । जा꣣गार । त꣢म् । ऋ꣡चः꣢꣯ । का꣣मयन्ते । अग्निः꣢ । जा꣣गार । त꣢म् । उ꣣ । सा꣡मा꣢꣯नि । य꣣न्ति । अग्निः꣢ । जा꣣गार । त꣢म् । अ꣣य꣢म् । सो꣡मः꣢꣯ । आ꣣ह । त꣡व꣢꣯ । अ꣣ह꣢म् । अ꣢स्मि । सख्ये꣢ । स꣣ । ख्ये꣢ । न्यो꣢काः । नि । ओ꣣काः ॥१८२७॥

Mantra without Swara
अग्निर्जागार तमृचः कामयन्तेऽग्निर्जागार तमु सामानि यन्ति । अग्निर्जागार तमयꣳ सोम आह तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः ॥

अग्निः । जागार । तम् । ऋचः । कामयन्ते । अग्निः । जागार । तम् । उ । सामानि । यन्ति । अग्निः । जागार । तम् । अयम् । सोमः । आह । तव । अहम् । अस्मि । सख्ये । स । ख्ये । न्योकाः । नि । ओकाः ॥१८२७॥

Samveda - Mantra Number : 1827
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्निः) अग्नि (जागार) जागता है (तम्) उसको (ऋचः) ऋचायें (कामयन्ते) चाहती हैं (अग्निः) अग्नि (जागार) जागता है (तम्) उसको (उ) ही (सामानि) साम (यन्ति) प्राप्त होते हैं (अग्निः) अग्नि (जागार) जागता है (तम्) उसको (अयम्) यह (सोमः) ओषधिगण (आह) कहता है कि (अहम्) मैं (न्योकाः) नियतस्थानस्थित (तव) तेरी (सख्ये) मित्रता में (अस्मि) हूं॥
भाव यह है कि पूर्व मन्त्र में जागरणशील होने की महिमा कही थी, अब इस मन्त्र में यह बताया है कि जो जागरूक रहना चाहते हैं, और ज्ञान तथा कर्म से अपना और संसार का भला करना चाहते हैं, उनको अग्नितत्त्व का बाहुल्य से सेवन और प्रयोग समझकर करना चाहिये क्योंकि अग्नि ही प्रकाश का हेतु, अन्धकार आलस्य नपुंसकता = पुरुषार्थहीनता का नाशक इत्यादि विशेषणविशिष्ट होने से सर्व होमादि और औषधप्रयोग तथा शिल्प कलाकौशल में प्रयुक्त होकर मनुष्यों को जागरण का फल देता है॥
Footnote
ऋग्वेद ५। ४४। १५ में भी॥