Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1826

1875 Mantra
Devata- विश्वे देवाः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यो꣢ जा꣣गा꣢र꣣ त꣡मृचः꣢꣯ कामयन्ते꣣ यो꣢ जा꣣गा꣢र꣣ त꣢मु꣣ सा꣡मा꣢नि यन्ति । यो꣢ जा꣣गा꣢र꣣ त꣢म꣣य꣡ꣳ सोम꣢꣯ आह꣣ त꣢वा꣣ह꣡म꣢स्मि स꣣ख्ये꣡ न्यो꣢काः ॥१८२६॥

यः꣢ । जा꣣गा꣡र꣢ । तम् । ऋ꣡चः꣢꣯ । का꣢मयन्ते । यः꣢ । जा꣣गा꣡र꣢ । तम् । उ꣣ । सा꣡मा꣢꣯नि । य꣣न्ति । यः꣢ । जा꣣गा꣡र꣢ । तम् । अ꣣य꣢म् । सो꣡मः꣢꣯ । आ꣣ह । त꣡व꣢꣯ । अ꣣ह꣢म् । अ꣣स्मि । सख्ये꣢ । स꣡ । ख्ये꣢ । न्यो꣢काः । नि । ओ꣣काः ॥१८२६॥

Mantra without Swara
यो जागार तमृचः कामयन्ते यो जागार तमु सामानि यन्ति । यो जागार तमयꣳ सोम आह तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः ॥

यः । जागार । तम् । ऋचः । कामयन्ते । यः । जागार । तम् । उ । सामानि । यन्ति । यः । जागार । तम् । अयम् । सोमः । आह । तव । अहम् । अस्मि । सख्ये । स । ख्ये । न्योकाः । नि । ओकाः ॥१८२६॥

Samveda - Mantra Number : 1826
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यः) जो मनुष्य (जागार) जागता है (तम्) उस को (ऋचः) ऋग्वेदमन्त्र (कामयन्ते) चाहते हैं (यः) जो (जागार) जागता है (तम्) उस को (उ) ही (सामानि) सामवेदवचन (यन्ति) प्राप्त होते हैं (यः) जो (जागार) जागता है (तम्) उस को (अयम्) यह (सोमः) सोमादि ओषधिगण (आह) कहता है कि (अहम्) मैं (न्योकाः) नियत स्थान वाला (तव) तेरी (सख्ये) मंत्री में (अस्मि) हूँ॥
जो पुरुष आलसी निद्रालु बहुत सोने वाले पुरुषार्थरहित हैं उनको न तो ऋग्वेदादि से ज्ञान प्राप्त होता है, न सोमादि ओषघियें काम देती हैं, परन्तु जो निरालस्य पुरुषार्थी जागरूक पुरुष हैं उनको वेद फलीभूत होते हैं और सोमादि ओषघिगण हितार्थ सामने हाथ जोड़े खड़े रहते हैं कि हम तुम्हारे ही लिये हैं और तुम्हारे ही हैं। इस वेदाज्ञा के पालनार्थ मनुष्यमात्र को पुरुषार्थी आलस्यरहित होना योग्य है॥
Footnote
ऋ० ५। ४४। १४ में भी॥