Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1825

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- अग्निः प्रजापतिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣡रिन्द्रा꣢꣯य पवते दि꣣वि꣢ शु꣣क्रो꣡ वि रा꣢꣯जति । म꣡हि꣢षीव꣣ वि꣡ जा꣢यते ॥१८२५

अ꣣ग्निः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । प꣣वते । दिवि꣢ । शु꣣क्रः꣢ । वि । रा꣣जति । म꣡हि꣢꣯षी । इ꣣व । वि꣢ । जा꣣यते ॥१८२५॥

Mantra without Swara
अग्निरिन्द्राय पवते दिवि शुक्रो वि राजति । महिषीव वि जायते ॥१८२५

अग्निः । इन्द्राय । पवते । दिवि । शुक्रः । वि । राजति । महिषी । इव । वि । जायते ॥१८२५॥

Samveda - Mantra Number : 1825
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्निः) यज्ञों में अग्रणी होने वाला अग्नि (इन्द्राय) देवों के लिये (पवते) हमारे दिये हव्य से अधिकाऽधिक सेचन करता है (शुक्रः) बलवीर्यवान् अग्नि (दिवि) आकाश में (विराजति) विराजता है और दृष्टान्त (महिषीव) भैंस के समान = जैसे भैंस तृणादि पाकर अनेक प्रकार के दुग्ध घृतादि पदार्थ उत्पन्न करती हैं, वैसे अग्नि हव्य पाकर देवों के निमित्त अनेक प्रकार के अन्नादि उत्पन्न करता है॥१॥
Footnote
N/A