Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 182

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ओ꣢ज꣣स्त꣡द꣢स्य तित्विष उ꣣भे꣢꣫ यत्स꣣म꣡व꣢र्तयत् । इ꣢न्द्र꣣श्च꣡र्मे꣢व꣣ रो꣡द꣣सी ॥१८२॥

ओ꣡जः꣢꣯ । तत् । अ꣣स्य । तित्विषे । उभे꣡इ꣢ति । यत् । स꣣म꣡व꣢र्तयत् । स꣣म् । अ꣡व꣢꣯र्तयत् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । च꣡र्म꣢꣯ । इ꣣व । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ ॥१८२॥

Mantra without Swara
ओजस्तदस्य तित्विष उभे यत्समवर्तयत् । इन्द्रश्चर्मेव रोदसी ॥

ओजः । तत् । अस्य । तित्विषे । उभेइति । यत् । समवर्तयत् । सम् । अवर्तयत् । इन्द्रः । चर्म । इव । रोदसीइति ॥१८२॥

Samveda - Mantra Number : 182
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यत्) जब कि (अस्य) इस राजा वा परमात्मा का (ओजः) बल (तित्विषे) प्रकाश करता है (तत्) तब (इन्द्रः) राजा वा परमेश्वर (उभे) दोनों (रोदसी) पृथिवी और द्युलोकों को (चर्मेव) ढाल के समान (समवर्तयत्) चारों ओर से वर्त्तमान कराता है॥
अर्थात् जब परमात्मा और पूर्ण बलिष्ठ राजा न्यायपरायणता से प्रजा की रक्षा के लिये अपने बल का प्रकाश करते हैं तब द्युलोक और पृथिवी लोक चर्म = ढाल के समान बचाने वाले बन जाते हैं। अर्थात् दैवी वा पार्थिवी कोई बाधा नहीं होती॥
Footnote
ऋ० ८। ६। ५ में भी॥