Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 18

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रयोगो भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
औ꣣र्वभृगुव꣡च्छुचि꣢꣯मप्नवान꣣व꣡दा हु꣢꣯वे । अ꣣ग्नि꣡ꣳ स꣢मु꣣द्र꣡वा꣢ससम् ॥१८॥

औ꣣र्वभृगुव꣢त् । औ꣣र्व । भृगुव꣢त् । शु꣡चि꣢꣯म् । अ꣣प्नवानव꣢त् । आ । हु꣣वे । अग्नि꣢म् स꣣मुद्र꣡वा꣢ससम् । स꣣मुद्र꣢ । वा꣣ससम् ॥१८॥

Mantra without Swara
और्वभृगुवच्छुचिमप्नवानवदा हुवे । अग्निꣳ समुद्रवाससम् ॥

और्वभृगुवत् । और्व । भृगुवत् । शुचिम् । अप्नवानवत् । आ । हुवे । अग्निम् समुद्रवाससम् । समुद्र । वाससम् ॥१८॥

Samveda - Mantra Number : 18
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(और्वभृगुवत्) पृथिवी के उपदेष्टाओं के समान और (अप्नवानवत्) कर्मकाण्डियों के समान, मैं (समुद्रवाससम्) आकाश में व्यापक (शुचिम्) पवित्र (अग्निम्) पूजनीय परमात्मा का (आ हुवे) आह्वान करता हूं कि वह मुझे प्राप्त हो।
भौतिक पक्ष में— (और्वभृगुवत्) पृथिवी के ज्ञानकाण्डियों के समान और (अप्नवानवत्) कर्मकाण्डियों के समान, मैं (समुद्रवाससम्) आकाश में व्यापी (शुचिम्) शोधने वाले (अग्निम्) अग्नि को (आ — हुवे) प्रधान करता हूं॥
उत्तम पुरुष दो प्रकार के हैं १—और्वभृगु ज्ञानकाण्डी जो पृथिवी से लेकर परमेश्वर पर्यन्त पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। ऋग्वेद में “अग्निमीडे पुरोहितं” इत्यादि मन्त्रों से मुख्य करके अग्न्यादि पदार्थों के गुणों का वर्णन किया है। २—अप्नवान जो कर्मकाण्ड में कुशल हैं, “इषे त्वोर्जे त्वा” इत्यादि मन्त्रों से यजुर्वेद में मुख्य करके कर्मकाण्ड यज्ञ, जिसका शिल्पविद्या का उपयोग भी अङ्ग है, उसका वर्णन है। तो तात्पर्य यह हुआ कि ऋग्वेदज्ञ ज्ञानकाण्डियों के समान मैं अग्नि के गुणों को जानकर यजुर्वेदज्ञ कर्मकाण्डियों के समान अग्नि को यज्ञकुण्ड में वा शिल्पसाधक यन्त्रादि में आाधान करता हूं। वह अग्नि शुचि है अर्थात् स्वयं मलिनतादि दोषरहित है और अपने संसर्ग से अन्य पदार्थों के मलिनता आदि दोषों का दूर करने वाला है। और अन्तरिक्ष में वायु के समान व्याप रहा है। जब हम कहीं अग्नि जलाते हैं तो थोड़ी देर में भस्म शेष रह जाता है और अग्नि गतिशील होने से प्रकाश में फल जाता है। इस प्रकार अग्नि की अदृश्य अवस्था हो जाती है और वह आकाश में व्यापा रहता है॥
Footnote
निघण्टु १।१॥ ३।३०॥ ५।५॥ २।१॥१। ३॥ अष्टाध्यायी ३।३।१२१॥ उणादि ४।२१८ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥