Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1791

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सुकक्ष आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
द्वि꣣ता꣡ यो वृ꣢꣯त्र꣣ह꣡न्त꣢मो वि꣣द꣡ इन्द्रः꣢꣯ श꣣त꣡क्र꣢तुः । उ꣡प꣢ नो꣣ ह꣡रि꣢भिः सु꣣त꣢म् ॥१७९१॥

द्वि꣣ता꣢ । यः । वृ꣣त्रह꣡न्त꣢मः । वृ꣣त्र । ह꣡न्त꣢꣯मः । वि꣣दे꣢ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । श꣣त꣡क्र꣢तुः । श꣣त꣢ । क्र꣣तुः । उ꣡प꣢꣯ । नः꣣ । ह꣡रि꣢꣯भिः । सु꣣त꣢म् ॥१७९१॥

Mantra without Swara
द्विता यो वृत्रहन्तमो विद इन्द्रः शतक्रतुः । उप नो हरिभिः सुतम् ॥

द्विता । यः । वृत्रहन्तमः । वृत्र । हन्तमः । विदे । इन्द्रः । शतक्रतुः । शत । क्रतुः । उप । नः । हरिभिः । सुतम् ॥१७९१॥

Samveda - Mantra Number : 1791
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यः) जो (इन्द्रः) इन्द्र वा परमेश्वर (वृत्रहन्तमः) मेघ वा पाप का अत्यन्त नाशक (शतक्रतुः) असंख्य कर्मों वाला है वह (द्विता) दो प्रकार का (विदे) जाना जाता है। वृत्रनाशादि उग्र कर्मों से उग्र और जगद्रक्षादि शान्तकर्मों से शान्त। (हरिभिः) व्यापक किरणों से (नः) हमारे (सुतम्) अभिषुत सोम को (उप) प्राप्त हो। ईश्वर पक्ष में—(नः) हम में से (सुतम्) स्तुतिकर्त्ता भक्त उपासक को (हरिभिः) व्यापक गुणों से (उप) प्राप्त हो [याहि] क्रियापद पूर्व मन्त्र में आया है, उसी से अध्याहार है।
Footnote
ऋ० ८। ९३। ३२ में भी॥