Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 179

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रो꣢ दधी꣣चो꣢ अ꣣स्थ꣡भि꣢र्वृ꣣त्रा꣡ण्यप्र꣢꣯तिष्कुतः । ज꣣घा꣡न꣢ नव꣣ती꣡र्नव꣢꣯ ॥१७९॥

इ꣡न्द्रः꣢꣯ । द꣣धीचः꣢ । अ꣣स्थ꣡भिः꣢ । वृ꣣त्रा꣡णि꣢ । अ꣡प्र꣢꣯तिष्कुतः । अ । प्र꣣तिष्कुतः । जघा꣡न꣢ । न꣣वतीः꣢ । न꣡व꣢꣯ ॥१७९॥

Mantra without Swara
इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः । जघान नवतीर्नव ॥

इन्द्रः । दधीचः । अस्थभिः । वृत्राणि । अप्रतिष्कुतः । अ । प्रतिष्कुतः । जघान । नवतीः । नव ॥१७९॥

Samveda - Mantra Number : 179
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अप्रतिष्कुतः) जिसके सामने कोई न ठहर सके ऐसा (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् सूर्य के तुल्य राजा (दधीचः) लक्ष्य पर ध्यान पड़ने योग्य पदार्थ के रचित (अस्थमिः) किरणतुल्य वाणों से (नव, नवतीः) नौ नव्वे ८१० (वृत्राणि) रोकने वाले अन्धकार वा मेघ तुल्य शत्रुसेना को (जघान) मारता है वा मारे॥
Footnote
संख्या के अङ्कों में ९ अङ्क ऐसा है जो किसी संख्या के साथ गुणो, योग से ९ ही रहता है। जैसे ९ को २ से गुणो तो १८ हुए, १८ में १ और ८ मिलाने से फिर ९ ही हुए। ९ को ३ से गुणो तो २७ हुए, २+७ = ९ हुए। ९ को ४ से गुणो तो ३६ हुए। ३+६= ६ ही आये। फिर ९ को ५ से गुणिये तो भी ४५ हुए ४+५ = ९ ही आये, ऐसा ही आगे जानो। जिस कारण ९ की संख्या दूसरी किसी संख्या से हनन करने पर भी पुनः पुनः उसी अपने स्वरूप में हो जाती है इस कारण नव नव्वे के अंक से शत्रुसेना को गिना है॥ अर्थात् बार-बार जुड़-जुड़ कर उसी स्वरूप से, सामने आए॥
सत्त्व रजः तमः इन तीन गुणों के भेद से तीन प्रकार की सेना होती है। फिर भूत भविष्यत् वर्त्तमान इन ३ कालकृत भेद से ९ प्रकार की हुई, फिर प्रभाव उत्साह और मन्त्र इन ३ शक्तियों के भेद से २७ गुणी हुई। फिर उत्तम मध्यम और अधम भेद से ८१ प्रकार की हुई। और दश दिशा के भेद से ८१० प्रकार हुए॥
सायणाचार्य इसमें इतिहास लिखते हैं कि—“शाकटायनी लोग इसमें इतिहास कहते हैं कि जीवते हुए आथर्वण दधीचि के दर्शनमात्र से असुर हार जाते थे। फिर जब दधीचि स्वर्ग सिधारा तो समस्त पृथिवी असुरों से भर गई। तब इन्द्र ने उन असुरों से युद्ध करने में असमर्थ हो, इस ऋषि (दधीचि) को ढूंढ़ते हुए सुना कि वह तो स्वर्ग को सिधार गया। तब इन्द्र ने वहाँ वालों से पूछा कि यहाँ उसका कुछ शेष अंग कोई है ? उस [इन्द्र] से कहा कि उसका शिर शेष है जिस शिर से उसने अश्वियों को मधुविद्या कही थी। परन्तु हम नहीं जानते कि वह कहां है ? फिर इन्द्र ने कहा कि उसे ढूंढ़िये। उन्होंने ढूंढ़ा। उसे शरणावती में पाय कर ले आये (शर्यणावत् कुरुक्षेत्र का नाम है) उसके शिर की हड्डियों से इन्द्र ने असुरों को मारा॥”
ऋग्वेद १। ८४। १ में भी ऐसी ही ऋचा है और उस पर स्वामी दयानन्द सरस्वती जी इस प्रकार भाष्य करते हैं कि—
“पदार्थ:— हे सेनापते जैसे (अप्रतिष्कुतः) सब ओर से स्थिर (इन्द्र) सूर्य लोक (अस्थभिः) अस्थिर किरणों से (नव नवतीः) निन्यानवे प्रकार के दिशाओं के अवयवों को प्राप्त हुए (दधीचः) जो धारण करने हारे वायु आदि प्राप्त होते हैं उन (वृत्राणि) मेघ के सूक्ष्म अवयवरूप जलों का (जघान) हनन करता है वैसे तू अनेक अधर्मी शत्रुओं का हनन कर॥
भावार्थ:—अत्र वाचकलु० — वही सेनापति होने के योग्य होता है जो सूर्य के समान दुष्ट शत्रुओं का हन्ता, और अपनी सेना का रक्षक है।”
सायणाचार्योक्त इतिहास से विरुद्ध विवरणकार का मत सत्यव्रत सामश्रमी जी बताते हैं कि——
“कालषञ्ज नाम असुर थे। उन असुरों से सताये हुए देवताओं ने ब्रह्मा के समीप जाकर कहा। भगवन् ! कालषञ्ज असुर सताते हैं। उनके मारने का उपाय कीजिये। यह सुन वह (ब्रह्मा) उनसे बोला कि दधीचि नाम ऋषि है उससे जाकर कहो, वह मारने का उपाय करेगा। वे (देवता) यह सुन, बहुत अच्छा कहकर उस दधीचि के समीप गये और कहा कि भगवन् ! उन (असुरों) का पुरोहित शुक्राचार्य हमारे अस्त्रों का अपहरण कर लेता है। उन (अस्त्रों) की रक्षा कीजिये। तब उस ऋषि ने उन (देवताओं) से कहा कि मेरे मुख में फेंक दो। तब मरुद्गणों सहित इन्द्रादि देवताओं ने (अस्त्र) उसके मुख में फेंक दिये। फिर समय पाय देवाऽसुर संग्राम हुआ तो देवताओं ने आकर कहा कि भगवन् ! वे हमारे अस्त्र दीजिये। तब उसने कहा कि वे तो मुझे पच गये अब वे फिर नहीं मिल सकते। तब ब्रह्मादि देवताओं ने कहा कि भगवन् ! प्राण त्याग कीजिये। यह सुन उसने प्राण त्याग दिये। उस दधीचि की अस्थि हड्डियों से इन्द्र ने वृत्रों को मारा”॥
वेदों का ऐतिहासिक अर्थ उनकी अपौरुषेयता का बाधक, और परस्पर सायण और विवरण का विरोध होने तथा मूल में इस प्रकार की कथा न होने से यह अनर्थ हमारे मन को नहीं भावता॥
निरुक्त १२। ३३ उणादि ३। १५४ वा ७। १। ७६ तथा सायणाचार्यादि की सम्मतियाँ संस्कृतभाष्य में ज्यों की त्यों उद्धृत हैं॥