Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 178

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ए꣣षो꣢ उ꣣षा꣡ अपू꣢꣯र्व्या꣣꣬ व्यु꣢꣯च्छति प्रि꣣या꣢ दि꣣वः꣢ । स्तु꣣षे꣡ वा꣢मश्विना बृ꣣ह꣢त् ॥१७८॥

ए꣣षा꣢ । उ꣣ । उषाः꣢ । अ꣡पू꣢꣯र्व्या । अ । पू꣣र्व्या । वि꣢ । उ꣣च्छति । प्रिया꣢ । दि꣣वः꣢ । स्तु꣣षे꣢ । वा꣣म् । अश्विना । बृह꣢त् ॥१७८॥

Mantra without Swara
एषो उषा अपूर्व्या व्युच्छति प्रिया दिवः । स्तुषे वामश्विना बृहत् ॥

एषा । उ । उषाः । अपूर्व्या । अ । पूर्व्या । वि । उच्छति । प्रिया । दिवः । स्तुषे । वाम् । अश्विना । बृहत् ॥१७८॥

Samveda - Mantra Number : 178
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
पूर्व मन्त्र में सायं सन्ध्या पर परमात्मा का धन्यवाद सिखाया गया। इसमें प्रातः काल का धन्यवाद कहते हैं (एषा उ) यही (अपूर्व्या) नवीना (प्रिया) प्यारी (उषाः) पीली [अरुणोदय की वेला] निरु० २। १८ (दिवः) द्युलोक से (व्युच्छति) फैलती है अर्थात् प्रातः हो गया इस लिये (अश्विना) हे पढ़ने-पढ़ाने वालो ! (वाम्) तुम (बृहत्) बहुतायत से इन्द्र परमात्मा की (स्तुषे) स्तुति करो॥
जिस प्रकार सूर्य प्रकाश करता और चन्द्रमा प्रकाश लेता है इसी प्रकार पढ़ाने वाला विद्या का प्रकाश देता और पढ़ने वाला लेता है। इसलिये निरुक्त के मतानुसारी “अश्विनी” के अर्थ सूर्य और चन्द्रमा से यहाँ पढ़ने-पढ़ाने वाले का ग्रहण है॥
Footnote
ऋ० १। ४६। १ में भी॥