Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 177

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- दध्यङ्ङाथर्वणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
दो꣣षो꣡ आगा꣢꣯द्बृ꣣ह꣡द्गा꣢य꣣ द्यु꣡म꣢द्गामन्नाथर्वण । स्तु꣣हि꣢ दे꣣व꣡ꣳ स꣢वि꣣ता꣡र꣢म् ॥१७७॥

दो꣣षा꣢ । उ꣣ । आ꣣ । अ꣣गात् । बृह꣢त् । गा꣣य । द्यु꣡म꣢꣯द्गामन् । द्यु꣡म꣢꣯त् । गा꣣मन् । आथर्वण । स्तुहि꣢ । दे꣣वम् । स꣣वि꣡ता꣢रम् ॥१७७॥

Mantra without Swara
दोषो आगाद्बृहद्गाय द्युमद्गामन्नाथर्वण । स्तुहि देवꣳ सवितारम् ॥

दोषा । उ । आ । अगात् । बृहत् । गाय । द्युमद्गामन् । द्युमत् । गामन् । आथर्वण । स्तुहि । देवम् । सवितारम् ॥१७७॥

Samveda - Mantra Number : 177
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(बृहद्गाय) बृहत् साम के गाने वाले ! (द्युमद्गामम्) प्रकाशयुक्त ज्ञान वाले ! (आथर्वण) अथर्ववेद के ज्ञातः ! ब्रह्मन् ! तू जब कि (दोषा) रात्रि, (उ, आगात्) आवे, तब (सवितारम्) सर्वोत्पादक (देवम्) परमात्मा की (स्तुहि) स्तुति कर॥
Footnote
ब्रह्मा का काम है कि यज्ञ में रात्रि का आरम्भ होते ही अर्थात् सायं सन्ध्या समय परमात्मा का धन्यवाद करके समाप्ति करें। यहाँ आथर्वण पद से ब्रह्मा सूचित होता है। क्योंकि—“ऋचां त्वः पोषमास्ते०” ऋ० १०। ७१। १ के प्रमाण से यज्ञ के होता अध्वर्यु उद्गाता और ब्रह्मा ये चार ऋत्विज् होते हैं। जिनमें से आपस्तम्ब के सूत्र “ऋग्वेदेन होता” इत्यादि १९। २०। २१। के पश्चात् २२ के अनुसार ब्रह्मा का काम चारों वेदों से पड़ता है और अथर्ववेद से चार वेद पूरे होते है। इस लिये ब्रह्मा को अथर्ववेद जानना भी आवश्यक है। और इसी से ब्रह्मा को आथर्वण कहा गया है। १ ऋग्वेद जानने वाला होता। २ ऋग्यजुः जानने वाला अध्वर्यु। ३ ऋग्यजुः साम का ज्ञाता उद्गाता और ४ ऋग्यजुः साम अथर्व का ज्ञाता ब्रह्मा होता है। ऋ० १०। ७१। १। आपस्तम्ब १९। २०। २१। २२ के प्रमाण संस्कृत भाष्य में देखिये॥
सत्यव्रत सामश्रमी कहते हैं कि “पदकार ने ‘दोषा, उ’ ऐसा पदच्छेद किया है।” इस लिये सायणाचार्य के भाष्य में “दोषः” यह एक पद करके जो अर्थ किया है वह पदकार के विरुद्ध है॥