Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1756

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
उ꣡द꣢पप्तन्नरु꣣णा꣢ भा꣣न꣢वो꣣ वृ꣡था꣢ स्वा꣣यु꣡जो꣢ अ꣡रु꣢षी꣣र्गा꣡ अ꣢युक्षत । अ꣡क्र꣢न्नु꣣षा꣡सो꣢ व꣣यु꣡ना꣢नि पू꣣र्व꣢था꣣ रु꣡श꣢न्तं भा꣣नु꣡मरु꣢꣯षीरशिश्रयुः ॥१७५६॥

उ꣢त् । अ꣣पप्तन् । अरुणाः꣢ । भा꣣न꣡वः꣢ । वृ꣡था꣢꣯ । स्वा꣣यु꣡जः꣢ । सु꣣ । आयु꣡जः꣢ । अ꣡रु꣢꣯षीः । गाः । अयु꣣क्षत । अ꣡क्र꣢꣯न् । उ꣣षा꣡सः꣢ । व꣣यु꣡ना꣢नि । पू꣣र्व꣡था꣢ । रु꣡श꣢꣯न्तम् । भा꣣नु꣢म् । अ꣡रु꣢꣯षीः । अ꣣शिश्रयुः ॥१७५६॥

Mantra without Swara
उदपप्तन्नरुणा भानवो वृथा स्वायुजो अरुषीर्गा अयुक्षत । अक्रन्नुषासो वयुनानि पूर्वथा रुशन्तं भानुमरुषीरशिश्रयुः ॥

उत् । अपप्तन् । अरुणाः । भानवः । वृथा । स्वायुजः । सु । आयुजः । अरुषीः । गाः । अयुक्षत । अक्रन् । उषासः । वयुनानि । पूर्वथा । रुशन्तम् । भानुम् । अरुषीः । अशिश्रयुः ॥१७५६॥

Samveda - Mantra Number : 1756
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अरुणाः) रक्तवर्ण वाली (भानवः) उषा की दीप्तियें (वृथा) यूं ही स्वाभाविक रीति से (उदाऽपप्तन्) उदय हो जाती हैं और (स्वायुजः) सुगमता से जुतने वाली (अरुषीः) शुभ्र उज्ज्वल (गाः) गौओं के समान किरणों को (अयुक्षत) जोतती है और (पूर्वथा) पूर्व के समान नियमानुसार (उषासः) उषा देवियें (वयुनानि) ज्ञानों को (अक्रन्) उत्पन्न कर देती हैं। उषःकाल में ही सब प्राणी स्वाभाविक नियम से ज्ञान को प्राप्त होते हैं। फिर—(अरुषीः) अरुण वर्ण की वे चमकती उषा की किरणें (रुशन्तम्) प्रकाशमान (भानुम्) सूर्य का (अशिश्रयुः) आश्रय करती हैं अर्थात् सूर्य के साथ मिलकर एक हो जाती हैं॥
Footnote
ऋ० १। ९२। २ में भी॥