Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1750

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
रु꣡श꣢द्वत्सा꣣ रु꣡श꣢ती श्वे꣣त्या꣢गा꣣दा꣡रै꣢गु कृ꣣ष्णा꣡ सद꣢꣯नान्यस्याः । स꣣मान꣡ब꣢न्धू अ꣣मृ꣡ते꣢ अनू꣣ची꣢꣫ द्यावा꣣ व꣡र्णं꣢ चरत आमिना꣣ने꣢ ॥१७५०॥

रु꣡श꣢꣯द्वत्सा । रु꣡श꣢꣯त् । व꣣त्सा । रु꣡श꣢꣯ती । श्वे꣣त्या꣢ । आ । अ꣣गात् । आ꣡रै꣢꣯क् । उ꣣ । कृष्णा꣢ । स꣡द꣢꣯नानि । अ꣣स्याः । समान꣡ब꣢꣯न्धू । समान꣢ । ब꣣न्धूइ꣡ति꣢ । अ꣣मृ꣡ते꣢ । अ꣣ । मृ꣢ते꣢꣯इ꣡ति꣢ । अ꣣नूची꣡इति꣢ । द्या꣡वा꣢꣯ । व꣡र्ण꣢꣯म् । च꣣रतः । आमिनाने꣢ । आ꣣ । मिनाने꣡इति꣢ ॥१७५०॥

Mantra without Swara
रुशद्वत्सा रुशती श्वेत्यागादारैगु कृष्णा सदनान्यस्याः । समानबन्धू अमृते अनूची द्यावा वर्णं चरत आमिनाने ॥

रुशद्वत्सा । रुशत् । वत्सा । रुशती । श्वेत्या । आ । अगात् । आरैक् । उ । कृष्णा । सदनानि । अस्याः । समानबन्धू । समान । बन्धूइति । अमृते । अ । मृतेइति । अनूचीइति । द्यावा । वर्णम् । चरतः । आमिनाने । आ । मिनानेइति ॥१७५०॥

Samveda - Mantra Number : 1750
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(रुशती) प्रकाशमाना (रुशद्वत्सा) प्रकाशमान सूर्य वा दिन वत्सवाली (श्वेत्या) उषा (आगात्) आती उदय होती है (उ) और (कृष्णा) रात्रि (अस्याः) इस उषा के (सदनानि) स्थानों को (आरैक्) रिक्त कर देती है। (समानबन्धू) ये दोनों रात्रि और उषा समान नियमरूपी बन्धन से बन्धी हैं (अमृते) अमर हैं कालरूप से नित्य होने से (अनूची) एक-दूसरे के पश्चात् चलने वाली हैं (वर्णम्) एक-दूसरे के रंग को (आमिनाने) नष्ट करती हैं और (द्यावा) आकाश मार्ग से सदा (चरतः) चलती हैं।
निरुक्त २। २० का व्याख्यान संस्कृतभाष्य में देखिये॥ भाव यह है कि जब चमकते हुए सूर्य वा दिन को उत्पन्न करने वाली चमकती हुई उषा आती है तो रात्रि उस आती हुई उषा के स्थानों को अपने शेष आधे प्रहर में खाली कर देती है, इस प्रकार सूर्य के उदय अस्त के पीछे-पीछे ये रात्रि और उषा घूमती रहती हैं, जब एक देश में दिन होता है तो उससे पश्चिम में उषा और उषा से पश्चिम में रात्रि, इसी प्रकार आगे-पीछे चक्र चलता रहता है। सूर्य को उषा का वत्स (पुत्र वा बछड़ा) इस लिये कहा है कि गौ के पीछे बछड़े के समान आगे-आगे उषा और उसके पीछे-पीछे सूर्य चलता जान पड़ता है। अथवा रस खींचने से दूध खींचने = चूंसने वाले बछड़े की उपमा है।
Footnote
कृष्ण शब्द कृष घातु से बना है उसका अर्थ = निकृष्ट रंग है।
ऋ० १। ११३। २ में भी॥