Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1741

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- सत्यश्रवा आत्रेयः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
या꣡ सु꣢नी꣣थे꣡ शौ꣢चद्र꣣थे꣡ व्यौच्छो꣢꣯ दुहितर्दिवः । सा꣡ व्यु꣢च्छ꣣ स꣡ही꣢यसि स꣣त्य꣡श्र꣢वसि वा꣣य्ये꣡ सुजा꣢꣯ते꣣ अ꣡श्व꣢सूनृते ॥१७४१॥

या꣢ । सु꣣नीथे꣢ । सु꣣ । नीथे꣢ । शौ꣣चद्रथे꣢ । शौ꣣चत् । रथे꣢ । व्यौ꣡च्छः꣢꣯ । वि꣣ । औ꣡च्छः꣢꣯ । दु꣣हितः । दिवः । सा꣢ । वि । उच्छ । स꣡ही꣢꣯यसि । स꣣त्य꣡श्र꣢वसि । स꣣त्य꣢ । श्र꣣वसि । वाय्ये꣢ । सु꣡जा꣢꣯ते । सु । जा꣣ते । अ꣡श्व꣢꣯सू꣣नृते । अ꣡श्व꣢꣯ । सू꣣नृते ॥१७४१॥

Mantra without Swara
या सुनीथे शौचद्रथे व्यौच्छो दुहितर्दिवः । सा व्युच्छ सहीयसि सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते ॥

या । सुनीथे । सु । नीथे । शौचद्रथे । शौचत् । रथे । व्यौच्छः । वि । औच्छः । दुहितः । दिवः । सा । वि । उच्छ । सहीयसि । सत्यश्रवसि । सत्य । श्रवसि । वाय्ये । सुजाते । सु । जाते । अश्वसूनृते । अश्व । सूनृते ॥१७४१॥

Samveda - Mantra Number : 1741
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सुनीथे) सुन्दर प्राप्ति वाली ! (शोचद्रथे) प्रकाशक रथ = रमणीय स्वरूप वाली ! (सहीयसि) अत्यन्त बलवती (सत्यश्रवसि) सच्चे यश वाली ! (अश्वसूनृते) व्यापक प्यारे शब्द वाली ! (दिवः दुहितः) द्युलोक वा सूर्य की पुत्री ! उषा ! देवि ! (या) जो तू (व्यौच्छः) पूर्व अन्धकार का नाश करती थी (सा) वही तू (व्युच्छ) अब भी अन्धकार को निवार॥
उषा = प्रभात बेला की स्तुति के बहाने मनुष्यों और स्त्रियों को परमात्मा का उपदेश है कि जो लोग उषःकाल में उठते हैं वे बड़े धन धान्यादि ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं, और जिन घरों में उषा के तुल्य गुणवती स्त्रियां होती हैं वहां भी धन धान्यादि की वृद्धि होती है। जैसे उषा का सुन्दर दर्शनीय जन्म सबको आह्लाद उत्पन्न करता है, जैसे उषःकाल में सब जन्तु प्यारा शब्द करते हैं, जैसे उषा सब ओर विस्तृत होती है, और जैसे प्रकाशमान है, वैसे ही उत्तम स्त्रियों को भी बनना चाहिये॥
Footnote
इस मन्त्र में सुजाते अश्वसूनृते शब्दों पर जो महाभाष्यकार पतञ्जलि मुनि ने अर्धएकार, अर्धओकार की आशंका और समाधान किया है उसको यहां सत्यव्रत सामश्रमी जी ने टिप्पणी में अंकित किया है।
ऋ० ५। ७९। २ में भी॥