Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1736

1875 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
या꣢वि꣣त्था꣢꣫ श्लोक꣣मा꣢ दि꣣वो꣢꣫ ज्योति꣣र्ज꣡ना꣢य च꣣क्र꣡थुः꣢ । आ꣢ न꣣ ऊ꣡र्जं꣢ वहतमश्विना यु꣣व꣢म् ॥१७३६॥

यौ꣢ । इ꣣त्था꣢ । श्लो꣡क꣢꣯म् । आ । दि꣣वः꣢ । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । ज꣡ना꣢꣯य । च꣣क्र꣡थुः꣢ । आ । नः꣣ । ऊ꣡र्ज꣢꣯म् । व꣣हतम् । अश्विना । युव꣢म् ॥१७३६॥

Mantra without Swara
यावित्था श्लोकमा दिवो ज्योतिर्जनाय चक्रथुः । आ न ऊर्जं वहतमश्विना युवम् ॥

यौ । इत्था । श्लोकम् । आ । दिवः । ज्योतिः । जनाय । चक्रथुः । आ । नः । ऊर्जम् । वहतम् । अश्विना । युवम् ॥१७३६॥

Samveda - Mantra Number : 1736
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अश्विना) हे अश्विनौ देवो ! (यौ) जो तुम दोनों (दिवः आ) द्युलोक से आरम्भ करके (जनाय) मनुष्यादि प्राणिवर्ग के लिये (ज्योतिः) प्रकाश को (इत्था) इस प्रकार हमारे अनुभव में आई रीति से (चक्रथुः) करते हो, (युवम्) वे तुम दोनों (श्लोकम्) प्रशंसनीय (ऊर्जम्) बलदायक अन्नरस को (नः) हमारे लिये (आ वहतम्) लाते हो॥
Footnote
अश्विनौ का अर्थ निरुक्त १२। १ में बहुत प्रकार से किया है। यथा—कोई द्युलोक पृथिवीलोक को, कोई दिन रात्रि को, कोई सूर्य चन्द्रमा को अश्विनौ कहते हैं, इत्यादि संस्कृतभाष्य में निरुक्त प्रमाण उद्धृत है॥
ऋग्वेद १। ९२। १७ में भी॥