Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1732

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
उ꣡षो꣢ अ꣣द्ये꣡ह गो꣢꣯म꣣त्य꣡श्वा꣢वति विभावरि । रे꣣व꣢द꣣स्मे꣡ व्यु꣢च्छ सूनृतावति ॥१७३२॥

उ꣡षः꣢꣯ । अ꣣द्य꣡ । अ꣣ । द्य꣢ । इ꣣ह꣢ । गो꣣मति । अ꣡श्वा꣢꣯वति । वि꣣भावरि । वि । भावरि । रेव꣢त् । अ꣣स्मे꣡इति꣢ । वि । उ꣣च्छ । सूनृतावति । सु । नृतावति ॥१७३२॥

Mantra without Swara
उषो अद्येह गोमत्यश्वावति विभावरि । रेवदस्मे व्युच्छ सूनृतावति ॥

उषः । अद्य । अ । द्य । इह । गोमति । अश्वावति । विभावरि । वि । भावरि । रेवत् । अस्मेइति । वि । उच्छ । सूनृतावति । सु । नृतावति ॥१७३२॥

Samveda - Mantra Number : 1732
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(गोमति) हे गौवों वा किरणों वाली (अश्वावति) घोड़ों वा प्राणों वाली ! (विभावरि) प्रकाश वाली (सूनृतावति) प्रिय सत्य वाणी वाली ! (उषः) प्रभातवेला ! तू (अस्मे) हम तेरे यजन करने वालों के लिये (अद्य) अब (इह) यहां (रेवत्) धनयुक्त अन्य भोग्य पदार्थ हों, ऐसा (व्युच्छ) अन्धकार को निवृत्त कर॥
उषः काल में उत्तम सुन्दर गौवें वा किरणें हों, उत्तम घोड़े वा प्राण हों, सुन्दर प्रकाश हो, मनुष्य पशु पक्षी आदि प्यारी वाणी को बोल रहे हों, उषा का यज्ञ हो रहा हो, ऐसी उषा = प्रभात बेला हमको हों, जिससे धन धान्य आदि सुखवृद्धिपूर्वक अन्धकार का निवारण नित्य हुआ करे॥
Footnote
ऋ० १। ६२। १४ में भी॥