Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1720

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
ग꣣म्भीरा꣡ꣳ उ꣢द꣣धी꣡ꣳरि꣢व꣣ क्र꣡तुं꣢ पुष्यसि꣣ गा꣡ इ꣢व । प्र꣡ सु꣢गो꣣पा꣡ यव꣢꣯सं धे꣣न꣡वो꣢ यथा ह्र꣣दं꣢ कु꣣ल्या꣡ इ꣢वाशत ॥१७२०॥

ग꣣म्भीरा꣢न् । उ꣣दधी꣢न् । उ꣣द । धी꣢न् । इ꣣व । क्र꣡तु꣢꣯म् । पु꣣ष्यसि । गाः꣢ । इ꣣व । प्र꣢ । सु꣣गोपाः꣢ । सु꣣ । गोपाः꣢ । य꣡व꣢꣯सम् । धे꣣न꣡वः꣢ । य꣣था । ह्रद꣢म् । कु꣣ल्याः꣢ । इ꣣व । आशत ॥१७२०॥

Mantra without Swara
गम्भीराꣳ उदधीꣳरिव क्रतुं पुष्यसि गा इव । प्र सुगोपा यवसं धेनवो यथा ह्रदं कुल्या इवाशत ॥

गम्भीरान् । उदधीन् । उद । धीन् । इव । क्रतुम् । पुष्यसि । गाः । इव । प्र । सुगोपाः । सु । गोपाः । यवसम् । धेनवः । यथा । ह्रदम् । कुल्याः । इव । आशत ॥१७२०॥

Samveda - Mantra Number : 1720
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
फिर सूर्य की ही शक्ति कहते हैं—सूर्य (इव) जैसे (गम्भीरान्) गहरे (समुद्रान्) समुद्रों को (पुष्यसि) पुष्ट करता भरता है, वैसे ही (क्रतुम्) यज्ञ को पुष्ट करता है (सुगोपाः) अच्छा गोपालक (इव) जैसे (गाः) गौवों को पुष्ट करता है, वैसे सूर्य भूमियों का पोषण करता है, (यथा) जैसे (धेनवः) गौवें (यवसम्) तृणादि भक्ष्य वा चारे को (प्र) प्राप्त होती है, वैसे सूर्य किरणें यज्ञ से भाग लेती हैं, (इव) धौर जैसे (कुल्याः) छोटी नदियें (ह्रदम्) गहरे जलाशय को (आशत) प्राप्त होती हैं, वैसे सूर्यकिरणगत सोमादि ओषधियों के रस आकाश समुद्र को व्यापते हैं॥
Footnote
ऋ० ३। ४५। ३ में भी॥